रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय में आपका स्वागत है

    कोविड-19 परिस्थिति में पशुपालको के लिये सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में पशुपालको के लिये सलाह जारी किया है। इस समय पूरे बुन्देलखण्ड में लॉकडाउन घोषित है। ऐसे कठिन समय में खेती बाड़ी सहित पशुधन की सुरक्षा अति आवश्यक है। यह समय रबी फसलों जैसे दलहन, तिलहन, गेहूॅ एवं अन्य फसलों की कटाई समाप्ति की ओर है। इस समय में तापमान बढना शुरू हो रहा है। पशुओं में पानी व नमक की कमी, भूख कम होना एवं कम दूध उत्पादन जैसी समस्याऐं आना शुरू हो जाती है अतः पशुओं को अत्यधिक तापक्रम से बचाने के उपाय करें। मालवाहक पशुओं को दोपहर से शाम 5 बजे तक छाया वाले एवं हवादार स्थान में आराम करने दें। पशुओं को दिन में कम से कम 4 से 5 बार पानी पिलाने का प्रयास करें। कुछ मादा पशुओं में गर्मी के लक्षण रात्रि में अधिक तथा दिन में कम दिखाई देते है। इसका पशुपालक नियमित ध्यान दें। थनैला रोग की पहचान एवं रोकथाम के उपाय करे। मैमनो को फडकियॉ व भेड़ चैचक रोग का टीका लगवाऐ। गाभिन पशुओं को प्रोटीन युक्त अतिरिक्त पशु आहार दे।

    इस समय चरागाह में हरे चारे का अभाव है तथा पोषण अपर्याप्त होता है ऐसे में पशुओं में पाईका रोग के लक्षण प्रकट होते है। इससे रक्षा हेतु मिनिरल ब्लॉक में लवण मिश्रण अवश्य मिलाऐ।

    सामूहिक प्रयासो से किसान सुनिश्चित करे कि मृत पशु, हड्डी चमड़ा, कंकाल आदि चारागाह के रास्तों एवं उन स्थानों पर इक्ट्ठा नही होने पाऐ जहा से पशुओं का रोजाना आना- जाना रहता है। एसे स्थानो की तार बन्दी कर पशुओं को रोके क्योकि मृत पशुओं के अवशेषों को खाने व चबाने से प्राणघातक बाटुलिनता रोग हो सकता है। जिसका कोई उपचार नही है। चारे के लिये बोई गई मक्का, बाजरा एवं ज्वार की कटाई 45 से 50 दिन की अवस्था में करें। पशुधन की देखभाल करते हुये मॉस्क का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे

    बुन्देलखण्ड में गरमी में खेतो की तैयारी एवं भूमि सुधार की सलाह

    बुन्देलखण्ड में रबी फसल कटाई समाप्ति कि ओर है ऐसे में भूमि सुधार एवं वर्षा जल संरक्षणं का कुछ काम अभी सामयिक एवं आवश्यक है इसमें असमतल बड़े खेतों का सुधार वर्षा जल संरक्षणं खेतों कि गहरी जुताई ऊसर भूमि सुधार एवं मिट्टी की जांच सम्मलित है । रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के दिशानिर्देशन में सामयिक सलाह जारी की गई है। किसान भाई भूमि विकास कार्य हेतु भू क्षेत्र की बनावट (टोपोग्राफी) को देखते हुए कि किस स्थान पर नलकूप व किस स्थान पर सिंचाई जल निकास नाली व सड़क बनाना उचित होगा, ऐसे स्थान को नियोजित योजना के अनुसार सर्वप्रथम मेड़ बन्दी करके खेत को समतल कर लें। यदि ढाल अधिक हो तो खेत का आकार छोटा अन्यथा 0.4 से 0.5 हेक्टेयर आकार के खेत बनाये जाए। मेड़ मजबूत बनायी जाए ताकि यह वर्षाकाल में जल बहाव के कारण बह न जाए। मेंड़ 165×45×30 से०मी० या 120×45×30 सेमी० जिसका क्रास सेक्शन 0.44 या 0.34 मीटर हो, उपयुक्त होगी।वर्षा जल संरक्षण हेतु किसान भाई मेड़बन्दी एवं खेत के चारों तरफ नाली बनाकर वर्षा जल को सिंचाई हेतु संग्रहीत करें एवं भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि करें ऊसर क्षेत्र का चयन, सर्वेक्षण एवं मृदा सुधारक रसायन का प्रयोग गर्मी में भूमि सुधार का यह काम जरूर करना चाहिये मेड़बन्दी का कार्य पूरा हो जाने के पश्चात् खेत को 15-20 से०मी० गहरा जोतकर लेवलर की सहायता से समतल कर लेना चाहिए और लेविल खेत में पानी भरके एकत्रित कर लेना चाहिए। नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि को 15-20 से०मी० की गहरी जुताई आवश्यक है जिससे नमक रिसाव क्रिया (लीचिंग) में सुविधा हो। ऊसर सुधार में जल निकास का बहुत अधिक महत्व है, जिससे खेत के हानिकारक घुलनशील लवणों को बाहर निकाला जां सकता है। जल निकास नाली का निर्माण चकरोड के दोनों ओर खेत की सतह से 60-90 से०मी० गहरी और 1.2 मीटर चौड़ी होनी चाहिए। इन जल निकास नालियों का नियोजन इस प्रकार किया जाए जिससे खेत का लवणयुक्त पानी किसी नदी नाले में बहा दिया जाए।ऊसर सुधार हेतु जिप्सम और रसायन का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। ऊसर योजना वाले जनपदों में मृदा सुधारक (जिप्सम/पाइराइट) का प्रयोग मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर करना चाहिए। इसके प्रयोग के पूर्व खेत में 5-6 मीटर चौड़ी क्यारियां लम्बाई में बना लेना चाहिए। मृदा परीक्षण परिणाम की संस्तुति के अनुसार मृदा सुधारक (पायराइट/जिप्सम) का प्रयोग किया जाये। जिप्सम का प्रयोगरू इसे फैलाने के बाद तुरन्त कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-10 से०मी० की सतह में मिलाकर और खेत को समतल करके पानी भर करके रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। पहले खेत में 12-15 से०मी० पानी भरकर छोड़ देना चाहिए। 7-8 दिनों बाद जो पानी बचे उसे जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर पुनः 12-15 से०मी० पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। मिट्टी की जांचरू फसल की कटाई हो जाने के उपरांत मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी हेतु मिट्टी की जांच हेतु मिट्टी नमूना एकत्रित कर नमूना प्रयोगशाला को प्रेषित करें तथा मृदा परीक्षण करवाएँ । किसान भाई गर्मी में खेतों कि गहरी जुताई (लगभग 9 से 12 इंच गहरी) करें। गर्मी में खेत मुख्यतः खाली पड़े रहते हैं। इसलिए अगली फसल की बुवाई की तैयारी एवं भूमि सुधार के लिए गर्मीं में गहरी जुताई का सर्वाधिक महत्व है। पूरे खेतों की एक समान जुताई करनी चाहिए तथा बिना जुताई वाला स्थान नहीं रहना चाहिए। जिन खेतों में कठोर तह (हार्ड पैन) बन गया हो उन खेतों में चिजलर का प्रयोग कर गहरी जुताई करें। गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें। इस गहरी जुताई से जल संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण कीट और रोग नियंत्रण में लाभ मिलता है। सारे कामों को करते हुये वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे।

    अप्रैल-मई माह में सब्जियों के खेती-बाड़ी की सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में सब्जी उत्पादको के लिये सलाह जारी की है। इस समय पूरे बुन्देलखण्ड में लॉकडाउन घोषित है। कद्दू वर्गीय फसलों में 4-5 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें, आवश्यकतानुसार यूरिया की टॉप ड्रेसिंग कर दें। ध्यान रखें कि यूरिया पत्तियों पर न गिरे अन्यथा फसल जल जायेगी।लाल भृंग कीट की रोकथाम के लिए सुबह ओस पड़ने के समय राख का बुरकाव करने से कीट पौधों पर नही बैठते हैं या इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर मैलाथियान चूर्ण 5 प्रतिशत या कार्बारिल 5 प्रतिशत के 25 किग्रा चूर्ण को राख में मिलाकर सुबह पौधों पर बुरकना चाहिये। भिण्ड़ी की फसल में नाइट्रोजन की प्रति हेक्टेयर 35-40 किग्रा मात्रा (76-87 किग्रा यूरिया) की पहली टाप ड्रेसिंग बोआई के 30 दिन बाद व शेष एक तिहाई 35-40 किग्रा नाइट्रोजन (76-87 किग्रा यूरिया) की दूसरी टाप ड्रेसिंग बोआई के 45-50 दिन बाद करें। भिण्ड़ी व लोबिया की फसल को पत्ती खाने वाले कीट से बचायें।भिण्ड़ी की फसल में फलो की तुड़ाई प्रत्येक तीसरे दिन करें अन्यथा तुड़ाई नियमित न करने पर फल बड़े हो जाते हैं तथा संख्या में कम प्राप्त होते है और उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। लहसुन व प्याज की खुदाई करें। खुदाई के 10-12 दिन पूर्व सिंचाई बन्द कर दें।पूर्व मे ंरोपी गई मिर्च में रोपाई के 25 दिन बाद प्रतिहेक्टेयर 35-40 किग्रा नाइट्रोजन (76-87किग्रा यूरिया) की प्रथम टॉप ड्रेसिंग व इतनी ही मात्रा की दूसरी टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 45 दिनों बाद करें।ग्रीष्मकालीन बैगन में रोपाई के 30 दिन बाद प्रति हेक्टेयर 50 किग्रा नाइटोजन (108किग्रा यूरिया) की पहली टॉप ड्रेसिंग व इतनी हीमात्रा की दूसरी टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 45 दिन बाद करें। वर्षा कालीन बैगन की नर्सरी यदि तैयार हो तो उसकी रोपाई 75-90×60 सेंमी की दूरी पर, जहाँ तक सम्भव हो, रोपाई शाम के समय करें तथा रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर दें। वर्षा कालीन बैगन की फसल के लिए नर्सरी में बीज की बोआई इस माह भी कर सकते हैं। नर्सरी तैयार करने के लिए लोटनल पॉली हाउस (एग्रोनेट युक्त) का प्रयोग करने से अच्छी गुणवत्ता की पौध तैयार होगी।टमाटर की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। फलों में छेद करने वाले कीट से बचाने के लिए फल तोड़ने के बाद मैलाथियान 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें। छिड़काव के 3-4 दिन बाद तक फलो की तुडाई न करें। बैंगन मैदानी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च में लगाई नर्सरी को अप्रेल में रोपाइ की जा सकती है। पूसा भैरव व पूसा पर्पललॉग किस्में उपयुक्त हैं।पहाडी क्षेत्रों में पूसा पर्पल कलस्टर किस्म अप्रैल में रोपने से बढिया उपज देती है। बैगन में तना छेदक कीट से बचाव के लिए नीमगिरी 4 प्रतिशत का छिड़काव 10 दिन के अन्तराल पर करने से अच्छा परिणाम मिलता हैं। या मार्सल (कार्बोसल्फान 20 ई.सी.) 2 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में धोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। सूरन की बोआई पूरे माह तथा अदरक व हल्दी की बोआई अप्रैल माह के दूसरे पखवाड़े से शुरू की जा सकती हैं।

    प्रति हेक्टेयर अदरक की बोआई के लिए लगभग 18 कुन्टल, हल्दी के लिए 15-20 कुन्टल व सूरन के लिए 75 कुन्टल बीज की आवश्यकता होती हैं। बोआई से पूर्व हल्दी व अदरक के बीज को 0.3 प्रतिशत का पर आँक्सीक्लोराइड के धोल में उपचारित कर लें।

    बोआई से पूर्व सूरन के बीज को 0.2 प्रतिशत बावेस्टीन या गोबर के धोल में डुबा दें। पुन उसे छाव में सुखाकर बोआई करनी चाहिए।हल्दी, अदरक व सूरन की बोआई के बाद खेत में सूखी पुवाल, धास-फूस या पत्ती से ढ़क दें। इससे खेत में खरपतवार का जमाव नही होता है, नमी संरक्षित रहने से फसल का जमाव भी अच्छा होता है तथा साथ ही इनके सड़ने से खेत में जीवांश पदार्थ की मात्रा भी बढ़ती हैं।चौलाई एक हरी पत्तेदार सब्जी है। पूसा कीर्ती व पूसा किरण किस्मों की बुआई अप्रेल के दूसरे पखवाडे. में कर सकते है। एक हैक्टर में बुवाई के लिए 1000 ग्राम बीज पर्याप्त रहता है। मूली की पूसा चेतकी किस्म की बुवाई अप्रेल में कर सकते है। बीजां की बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखते हुए 1-1.5 सेमी गहराइ पर लगाएं। बुवाई से पूर्व 10 टन कम्पोस्ट, 80 -100 किग्रा नत्रजन, 50 किग्रा फास्फोरस तथा 80-100 किग्रा पोटाश प्रति हैंक्टर की दर से डालें। फसल में जल्दी-जल्दी हल्की सिंचाईयां करें। ग्वार फलियों के लिए पूसा सदाबहार, पूसा मौसमी व पूसा नववहार किस्में अप्रैल में लगा सकते है। 8-10 कि.ग्रा. बीज को 45 सेमी दूरी पर लाईनों में लगाएं तथा बुवाई से पूर्व 10 टन कम्पोस्ट, 50 किग्रा नत्रजन, 60 किग्रा फास्फोरस तथा 60 किग्रा पोटाश प्रति हैंक्टर की दर से डालें। फलियाँ सब्जी के लिए जून में तैयार मिलती है। वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे। (परामर्शी वैज्ञानिकः- डॉ ए0 के0 पाण्डेय, डॉ अर्जुन लाल औला)

    महुआ फूलो के संकलन पर सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में महुआ उत्पादको के लिये सलाह जारी की है। महुआ बुन्देलखण्ड की एक प्रमुख फल वृक्ष है। अप्रैल में इसके फूलो का संकलन किया जाता है। फूलो को इक्ठ्ठा करते समय कुछ सावधानियॉ किसानों को बरतने की जरूरत है। महुआ के फूल, पेड़ पर चढ़कर वृक्ष की टहनियों को हिलाकर जमीन पर गिरा कर एकत्रित किये जा सकते है। समान्यतः आदिवासी, वृक्ष पर चढ़ने में निपुण होते है जो पेड़ पर चढ़कर फूलों के एकत्रित करते है। लेकिन जमीन पर खड़े रहकर, एक लम्बे डंडे या बांस का उपयोग कर फूलों को जमीन पर गिराना उचित रहेगा। भालू, हिरन, सांबर को महुआ का फूल बहुत प्रिय होते है जिससे वह अपने पौष्टिक आहार की पूर्ति करते है।जंगली हिरन, सांबर पर शेर, तेंदुआ घात लगाए रहते है। इन जंगली जानवरों से अपना बचाव करे।पेड़ से नीचे गिरे फूलों को उठाने के लिए ज्यादा देर झुक कर काम ना करे। इससे शेर तथा तेंदुए को यह आभास होता है की आप हिरन है, और आप पर हमला कर सकते है। सामान्यतः जंगलों में मनुष्य इस के फूलों का संकलन समूह में करते है, जिससे एक - दूसरे को जंगली खतरों से सावधान किया जा सके। महुआ के फूलों के अंदर बहुत गाढ़ा- चिपचिपा रस भरपूर होने कारण, पेड़ पर मधुमख्खियाँ होती है। फूल इकठ्ठा करने से पहले यहाँ सुनिश्चित करले ही पेड ़पर मधुमख्खियों का छत्ता नहीं है। अगर है तो किसी प्रकार मख्खियों को भगाकर अपना बचाव करें। महुआ के फल बहुत नाजुक होने कारण, बड़ी सावधानी से उन्है एकत्रित करें। सामान्यतः फूलों को एकत्रित करने से पहले, पेड़ की निचली जमीन सांफ करने हेतु आग लगाई जाती है। इससे जंगलों में आग फैलने का खतरा होता है। इस विधि को अपनाने के बजाय जमीन पर चादर, दरी, फर्श या प्लास्टिक की चादर बिछाकर, लम्बे डंडे का प्रयोग कर फूलों को गिराया जा सकता है। एकत्रित किये गए फूल बोरी में भरकर एक स्थान पर लाए जाए और धूप में सूखा दे। सुखाये जाने पश्चात, यह सुनिश्चित किया जाये की फूल धूल , मिटटी एवं कंकड़ से मुक्त हो, और छोटी थैलियों में भरकर उन्हें व्यापार हेतु भेजा जा सके। सूखा हुआ फूल बाजार में ९० - ११० रुपये प्रति किलो बेचे जा सकते है। वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे।

    पोषक सुरक्षा और कोरोना वायरस के प्रति अवरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु मोटे अनाजों पर बल दे

    वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है। समृद्ध देशों के हजारों लोग अपनी जान गवां चुके हैं और अभी इसके समाधान का कोई कारगर उपाय नहीं निकल पाया है। कोरोना वायरस के वचाव हेतु कई उपायों की सिफारिश की जा रही है जैसे कि अपने घर में ही बन्द रहना, सामाजिक दूरी बनाए रखना, अपने आप को और आस-पास के वातावरण को स्वच्छ रखना, खान-पान में कुछ खास पदार्थों को शामिल करना, इत्यादि। ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस की समस्या जल्द खत्म होने वाली नहीं है और अभी काफी समय तक हमें इस के साथ जीना होगा।

    मानव शरीर में बीमारियों के प्रति अवरोधक क्षमता विकसित करने में खान-पान का काफी महत्व है। कुछ लोग अति संवेदनशील होते हैं और जल्द ही बीमारी के प्रकोप में आ जाते हैं। लेकिन कुछ लोगों में बीमारियों के जनक विभिन्न जीवाणुओं विषाणुओं एवं अन्य कीटाणुओं के प्रति अवरोधक क्षमता होती है और वह उनको काफी हद तक सहन कर जाते हैं और इनसे बच जाते हैं। कोरोना के सम्बंध में भी यह सत्य है। हल्दी, लहसुन, जीरा, फल-सब्जी आदि की सिफारिश की जा रही है। जिससे की शरीर में अवरोधक क्षमता विकसित हो सके। इस सन्दर्भ में मोटे अनाजों जैसे ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सांवा आदि फसलों की महत्तवपूर्ण भूमिका है, जिनके सेवन से कोरोना के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। मोटे अनाज वाली फसलों में धान-गेहूं की तुलना में मिनरल, प्रोटीन, विटामिन आदि पोषक तत्त्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं और पाचक दृष्टि से भी स्वास्थ्य के लिये बड़ी हितकारी मानी जाती है। इन फसलों में पाये जाने वाले रेशे पाचन तंत्र के लिये उपयोगी प्रोबायोटिक की वृद्धि में महत्तवपूर्ण योगदान देते हैं। इसलिये ज्यादा शारीरिक कार्य करने वाले एवं कठिन परिस्थितियों में भी रहने वाले लोग इनका सेवन कर अच्छे से गुज़ारा कर लेते हैं।

    हमारे देश में और खासकर बुंदेलखण्ड क्षेत्र में मोटे अनाज की फसलों की खेती किसी ज़माने में बड़े व्यापक तौर पर की जाती थी लेकिन धीरे-धीरे इन फसलों का क्षेत्रफल कम होता गया क्योंकि इन फसलों की अधिक पैदावार देने वाली प्रजातियों का विकास और मंडी में उचित समर्थन मूल्य नहीं मिल पाया। पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है और इन पोषक अनाजों की गुणवत्ता युक्त प्रजातियों का विकास हुआ है एवं उनके समर्थन मूल्य में भी उत्साहवर्धक वृद्धि की गयी है ताकि किसान भाई दोवारा इन फसलों की खेती की तरफ आकर्षित हों और अपनी पोषक सुरक्षा एवं बीमारियों के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ायें। यह भी सच है कि बीमारियों के पनपने में व्यक्ति के जीनोम में पाये जाने वाले विभिन्न जीनों, पोषकता एवं पर्यावरण, और परस्पर संबंधों का योगदान रहा है।

    कृषि विशेषज्ञों द्वारा सिफारिश की गई है कि वर्तमान समय में जबकि हमारे पास खाद्यानों का पर्याप्त भण्डार मौजूद है, ज्वार, बाजरा एवं अन्य मोटे अनाजों की तरफ भी ध्यान देना जरूरी है ताकि खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषक सुरक्षा एवं कोरोना अवरोधक क्षमता को भी सुधारा जा सके। डा. एम. एस. स्वामीनाथन के अनुसार श्खाद्य सुरक्षा ही काफी नहीं है देश को तेज गति से पोषक सुरक्षा की तरफ ले जाना है। इसके लिये दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों को बढ़ावा देना होगा।ष्ष् एक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मशहूर वैज्ञानिक डा. राजीव वार्ष्णेय का मानना है श् भारत इन फसलो की पैदावार में दुनिया में श्रेष्ठ है और अपने लोगो को स्वस्थ रखना एवं कोरोना के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिये पोषक दृष्टि से महत्तवपूर्ण मोटे अनाजो को प्रोत्साहन देना अत्यंत जरूरी है।ष्ष्

    झॅासी में स्थापित रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत निदेशक शिक्षा डा.अनिल कुमार ने मण्डुआ (रागी) पर शोध कार्य करते हुये इसे न्यूट्री डेन्स अद्भुत अनाज की संज्ञा देते हुये बताया कि इस छोटे दाने वाली मिलेट फसल में शरीर के लिये अति आवश्यक अमीनो एसिड से युक्त गुणक्ता प्रोटीन के अलावा देर से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट एवं हड्डियों को मजबूती प्रदान करने वाले अवयव पाये जाते हैं। इन्हीं गुणों के कारण रागी एवं अन्य मिलेट परिवार वाली फसलों से डायविटीज, ह्नदयरोग, आस्टीयोफेरोसिस, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने एवं पाचन तंत्र आदि के लिये मूल्य संबर्धित उत्पादों की श्रृंख्ला बनाने हेतू विश्वविद्यालय आने वाले समय में कार्य करने जा रहा है। विश्वविद्यालय के निदेशक शोध डा. ए. आर. शर्मा ने बताया कि दलहनी, तिलहनी फसलों के अलावा मोटे अनाज की फसलों को बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बढ़ावा देने हेतु पहल की गई है। ज्वार, बाजरा, कोदो, सांवा आदि फसलों की उन्नत प्रजातियों का शुद्ध बीज तैयार किया गया है जो आने वाले खरीफ मौसम में किसानों के लिये उपलब्ध होगा। यह फसलें कम उपजाऊ शक्ति वाली जमीन में भी अच्छे से उगाई जा सकती हैं। ज्यादा खाद पानी की जरूरत भी नहीं होती है और जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भी बड़ी सहनशील मानी जाती हैं। जो किसान भाई इन फसलों का उत्पादन करना चाहते हैं वह विश्वविद्यालय से सम्पर्क कर सकते हैं।

    विश्व पृथ्वी दिवस पर बुन्देलखण्ड के किसानो को भूमि सुधार की सलाह

    बुन्देलखण्ड में रबी फसल कटाई समाप्ति कि ओर है ऐसे में भूमि सुधार एवं वर्षा जल संरक्षणं का कुछ काम अभी सामयिक एवं आवश्यक है इसमें

  • खेतों कि गहरी जुताईः किसान भाई गर्मी में खेतों कि गहरी जुताई (लगभग 9 से 12 इंच गहरी) करें। पूरे खेतों की एक समान जुताई करनी चाहिए तथा बिना जुताई वाला स्थान नहीं रहना चाहिए। जिन खेतों में कठोर तह (हार्ड पैन) बन गया हो उन खेतों में चिजलर का प्रयोग कर गहरी जुताई करें। गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें। इस गहरी जुताई से जल संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण कीट और रोग नियंत्रण में लाभ मिलता है।

  • वर्षा जल संरक्षणं हेतु असमतल बड़े खेतों का सुधारः भू क्षेत्र की बनावट (टोपोग्राफी) को देखते हुए कि किस स्थान पर नलकूप व सड़क बनाना उचित होगा, ऐसे स्थान को नियोजित योजना के अनुसार सर्वप्रथम मेड़ बन्दी करके खेत को समतल कर लें। यदि ढाल अधिक हो तो 0.4 से 0.5 हेक्टेयर आकार के खेत बनाये जाए। मेड़ मजबूत बनायी जाए ताकि यह वर्षाकाल में जल बहाव के कारण बह न जाए। वर्षा जल संरक्षण हेतु किसान भाई मेड़बन्दी एवं खेत के चारों तरफ नाली बनाकर वर्षा जल को सिंचाई हेतु संग्रहीत करें एवं भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि करें।

  • ऊसर भूमि सुधारः ऊसर खेत को गहरा जोतकर लेवलर की सहायता से समतल कर लेना चाहिए और लेविल खेत में पानी भरके एकत्रित कर लेना चाहिए। नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि को 15-20 से०मी० की गहरी जुताई आवश्यक है जिससे नमक रिसाव क्रिया (लीचिंग) में सुविधा हो। जल निकास नाली का निर्माण चकरोड के दोनों ओर खेत की सतह से 60-90 से०मी० गहरी और 1.2 मीटर चौड़ी होनी चाहिए। मृदा सुधारक (जिप्सम/पाइराइट) का प्रयोग मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर करना चाहिए। इसके प्रयोग के पूर्व खेत में 5-6 मीटर चौड़ी क्यारियां लम्बाई में बना लेना चाहिए। जिप्सम का प्रयोग इसे फैलाने के बाद तुरन्त कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-10 से०मी० की सतह में मिलाकर और खेत को समतल करके पानी भर करके रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। पहले खेत में 12-15 से०मी० पानी भरकर छोड़ देना चाहिए। 7-8 दिनों बाद जो पानी बचे उसे जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर पुनः 12-15 से०मी० पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए।

  • मिट्टी की जांचः फसल की कटाई हो जाने के उपरांत मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी हेतु मिट्टी की जांच हेतु मिट्टी नमूना एकत्रित कर नमूना प्रयोगशाला को प्रेषित करें तथा मृदा परीक्षण करवाएँ ।

  • सारे कामों को करते हुये वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे। (परामर्शी वैज्ञानिकः- डॉ योगेश्वर सिंह, डॉ सुशील कुमार सिंह, डॉ सौरभ सिंह)

  • अप्रैल-मई माह में पौध सरक्षण सलाह

    वर्तमान में मूंग, कद्दू वर्गीय फसलें और भिन्डी खेत में लगी हैं। इसमें कीडे और बीमारी लग रहे हैं जिनसे फसल की बचाव करना है। अतः किसानों को सामयिक सलाह दी जा रही है।

    मूंग का पीला मोजेक विषाणु रोग
    नियंत्रणः रोग की शुरुवाती अवस्था में रोगग्रस्त पौधे उखाड़कर नष्ट करे। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रीड १७.८ एस एल ०.५ मिली या ऐसीटामिप्रीड २० एस पी. ०.५ ग्राम या डायमिथोएट २ मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करे। प्रति एकड़ खेत में १० पीला चिपचिपा पाश लगायें।

    मूंग का चूर्णिल आसिता (पाऊडरी मिल्डयू )
    नियंत्रण : सल्फर फफूंद नाशी ४ ग्राम या केराथेन १ मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें

    कद्दू वर्गीय फसलों में मृदुरोमिल असिता (डाउनी मिल्डयू) रोग
    नियंत्रण : रोग के लक्षण दिखाई देते ही मेटाल्याक्सिल या रिडोमिल एम झेड १ ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिडकाव करें

    कद्दू वर्गीय फसलों में लाल भृंग (रेड पम्पकिन बीटल) कीट
    मैलाथियान 50 ईसी / 500 मिली या डाइमेथोएट 30 ईसी 500 मिली या मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी / 500 मिली हेक्टेयर का छिड़काव करें क्लोरपायरीफॉस 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से करनवयस्क कद्दू के बीटल मर जाते हैं

    भिन्डी में पीत शीरा मोजेक रोग
    नियंत्रणः खेत में पीला चिपचिपा पाश १० प्रति एकड़ खेत में खड़ा करें रोग की शुरुवाती अवस्था में रोगग्रस्त पौधे उखाड़कर नष्ट करे सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रीड १७.८ एस एल ०.५ मिली या ऐसीटामिप्रीड २० एस पी. ०.५ ग्राम या डायमिथोएट २ मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करे।

    अन्य सावधानियाँ
    कृषि श्रमिक एवं समस्त किसान कार्य मे क्रियान्वयन होने से पहले, कार्यो के दौरान एवं कार्यो के उपरांत व्यक्तिगत स्वछता तथा उचित दूरी को सुनिश्चित करें। यथा संभव गेंहू की कटाई के लिए कम्बाइन कटाई मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए। फसल कटाई एवं मशीनों के रख रखाव मे लगे श्रमिकों की सावधानी एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। फसलों की हाथ से कटाई एवं तुड़ाई के दौरान कार्यरत श्रमिकों के बीच उचित दूरी का ध्यान रखें । कार्यरत सभी किसान श्रमिकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि वे मास्क पहनकर ही काम करे तथा बीच-बीच मे साबुन से हाथ धोते रहे। किसी अनजान श्रमिक को खेत मे कार्य से रोके ताकि वो इस महामारी का कारण न बन सके। जहां तक संभव हो परिचित व्यक्ति को ही खेतो के कार्य मे लगाए। कृषि कार्य मे प्रयुक्त सन्यंत्रों को कार्यों के पूर्व तथा कार्यो के दौरान स्वच्छ किया जाना चाहिए। साथ ही भण्डारण समग्रियों को भी साफ किया जाना चाहिए। खलिहानों मे कटी हुई फसल को छोटे-छोटे ढेरों मे इकठ्ठा करे जिनकी आपस मे दूरी 1 मीटर से अधिक हो। साथ ही प्रत्येक ढेर पर भीड़ इकठ्ठा करने से बचे। प्रक्षत्रो पर कृषि कार्यो दौरान किसानों श्रमिकों को चेहरे पर मास्क अवश्य लगाना चाहिए ताकि वायु-कण एवं धूल-कण से बचा जा सके और श्वास संबन्धित तकलीफों से सावधान रहा जा सके। अनाजों तथा दालों को कीटों से बचाने हेतु, भंडारण के पूर्व उन्हे पर्याप्त सुखा ले कृषक भाई अपने उत्पादो को बाजार स्थल तक ले जाने के दौरान अपनी निजी सुरक्षा का भरपूर ध्यान रखे। कृषक बंधु हरी खाद के सनई, ढैचा की बुवाई के लिए खेत तैयार करें तथा ४५-५० किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। साथ ही खरीफ फसलों कि तैयारी हेतु खेतों कि ग्रीष्मकालीन जुताई का कार्य भी करें। (श्रोत-पी.पी. जाम्भूलकर, अनीता पूयाम)

    पर्यावरण एवं खेत की मिट्टी का स्वास्थ्य बचाने हेतु गेंहूॅ की नरवाई न जलाएं

    बुंदेलखण्ड में आजकल देखा जा रहा है कि कहीं कहीं किसान भाई गेहू कटाई के बाद खेत में शेष बचे अवशेष (नरवाई) में आग लगा रहे है,जबकि राज्य सरकार एवं कृषि वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर नरवाई नहीं जलाने हेतु जागरूकता रैली, कृषक प्रशिक्षण, कृषक संगोष्ठी व मिडिया का सहयोग लेकर अखबार, रेडियों एवं टीवी के माध्यम से जानकारी दी जाती रहती है। साथ ही जिला प्रशासन द्वारा भी नरवाई जलाने को गम्भीर अपराध की श्रेणी में लेकर सजा का प्रावधान किया गया है। नरवाई जलाने के बारे में किसान भाईयों में विगत वर्षो में काफी जागरूकता आयी है। फिर भी कुछ किसान सहयोग नहीं कर रहें एवं चोरी छुपे सुबह, शाम या देर रात में खेत में नरवाई जला देते है।अतः किसानभाईयों से आग्रह है, कि वे अपने खेत में आग न लगाएं एवं नरवाई न जलाएं। अपने खेत की मिट्टी को जीवित रखे एवं शासन प्रशासन का सहयोग करें, पर्यावरण को बचाएं। नरवाई जलाने से नुकसान-कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि,गेहू की फसल काटने के बाद जो नरवाई होती है, किसानभाई उसे आग लगाकर नष्ट कर देते है। नरवाई में लगभग नत्रजन 0.5 प्रतिशत, स्फुर 0.6 और पोटाश 0.8 प्रतिशत पाया जाता है, जो नरवाई में जलकर नष्ट हो जाता है। गेहू फसल के दाने से डेढ़ गुना भूसा होता है। यदि एक हेक्टर में 40 क्विंटल गेहू का उत्पादन होगा, तो भूसे की मात्रा 60 क्विंटल होगी, भूसे से 30 किलों नत्रजन, 36 किलों स्फुर, 90 किलों पोटाश प्रति हेक्टेयर प्राप्त होगा। जो वर्तमान मूल्य के आधार पर लगभग रूपए 3000 का होगा, जो जलकर नष्ट हो जाता है। भूमि में उपलब्ध जैव विविधता समाप्त हो जाती है, अर्थात् भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीव एवं केचुआं आदि जलकर नष्ट होने से खेत की उर्वरकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। भूमि क उपरी पर्त में उपलब्ध पोषक तत्व आग लगने के कारण जलकर नष्ट हो जाते है। भूमि की भौतिक दशा खराब हो जाती है। भूमि कठोर हो जाती है, जिसके कारण भूमि की जल धारण क्षमता कम हो जाती है। फलस्वरूप फसलें जल्द सूखती है। भूमि में होने वाली रासायनिक क्रियाएं भी प्रभावित होती है, जैसे कार्बन-नाईट्रोजन एवं कार्बन-फास्फोरस का अनुपात बिगड़ जाता है। जिससे पौधों को पोषक तत्व ग्रहण करने में कठिनाई होती है। नरवाई की आग फैलने से जन-धान की हानि होती है एवं पेड़ पौधे जलकर नष्ट हो जाते है। नरवाई नहीं जलाने के फायदे प्रति हेक्टेयर लगभग रूपये 3000 की बचत,भूमि में पाये जाने वाले लाभदायी जीवणुओं का संरक्षण, पोषक तत्वों का संरक्षण,भूमि की भौतिक दशा में सुधार होगा।भूमि की रासायनिक क्रियाओं में सन्तुलन होने से पोषक तत्वों की उपलब्धता सुलभ होगी।पर्यावरण प्रदुषण में कमी आवेगी।अतः किसान भाई नरवाई में आग न लगाये। खेत की जुताई करे या रोटावेटर चलाकर नरवाई को यथास्थान जमीन में मिला दे। जिससे जैविक खाद तैयार होगी और नरवाई जलाने के दुष्परिणामों को कम किया जा सकेगा।

    गर्मियों में प्राकृतिक जूस से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा जल की मात्र बढ़ाएं

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ अमित सिंह , डॉ धनश्याम अवरौल तथा डॉ रंजीत पाल ने बताया है कि इस समय कोरोना वायरस के प्रकोप में शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा जल की मात्रा बढाना आवश्यक है। इसके लिये मौजूद प्राकृतिक रसों का उपयोग किया जा सकता है ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक पानी और जूस पीने की सलाह दी जाती है। क्योंकि गर्मियों में हमारी बॉडी डिहाइड्रेट हो जाती है, आप अपने शरीर में पानी की कमी जूस के जरिए भी पूरी कर सकते हैं। टेस्ट के साथ-साथ अपनी हेल्थ का भी ध्यान रखते हुए गर्मियों में अपनी बॉडी को स्वच्छ, स्वस्थ और रिफ्रेश रखने के लिए परंपरागत जूस के साथ-साथ कुछ नए ड्रिंक का भी प्रयोग कर सकते हैं। पूरे दिन की थकान और गर्मी को भगाने के लिए इन अलग-अलग जूस का सेवन कर सकते हैं। आम, बेल, गन्ना, नीबू, पपीता, पुदीना, मौसमी तरबूज आदि का रस प्राकृतिक रूप से गर्मियों में उपलब्ध होता है। इनसें विटामिन, लवण, प्रोटीन, और अन्य पोषक तत्व मिलते है।

    आम का जूस
    -आम के सेवन करने से कई बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है इसके साथ ही यह स्वाद में काफी अच्छा होता है। इसमें विटामिन्स और मिनरल्स अधिक मात्रा में होता है। जिनकी जरूरत बॉडी को गर्मियों में अधिक होती है। यह पेट और दिल से संबंधित बीमारियों को भी कम करता है। आम के जूस में विटामिन सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है जो प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। एक गिलास आम के जूस हमारे शरीर में 70 से 80 प्रतिशत विटामिन सी की पूर्ति करता है। विटामिन सी श्वेत रक्त कणिकाओं के उत्पादन में भी लाभप्रद है।

    बेल का जूस या शरबत
    -बेल के जूस में प्रोटीन, थायमिन, राइबोफ्लेविन और विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके नियमित सेवन से एसिडिटी नियंत्रण के साथ-साथ मुंह में छाले और मधुमेह का भी नियंत्रण होता हैं।

    गन्ने का रस
    -गर्मियों में हीट स्टोक अथवा डिहाइड्रेशन से बचने के लिए गन्ने का रस सबसे बेहतर विकल्प है। इसमें ग्लूकोज, मैग्नीशियम, कैल्शियम अधिक मात्रा में होता है। यह बहुत ही तेजी से बॉडी को हाइड्रेट करता है। इसके साथ ही ज्वाइंडिस जैसी घातक बीमारी में कारगर है साथ ही गर्भवती महिलाओं के लिए बेहतरीन पेय पदार्थ है। इस कारण एनीमिया कैंसर आदि बीमारियों से हमें बचाता है।

    लेमन जूस
    -अदरक के साथ नींबू का जूस गर्मियों में काफी लाभदायक होता है इसमें विटामिन सी पाई जाती है जो पेट के लिए काफी लाभदायक है। नींबू अदरक का जूस बालों, स्किन के साथ-साथ मसूड़ों की बीमारियों और पथरी को भी ठीक करता है।

    पपीते का जूस
    -पपीते के जूस में विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, फाइबर, मैग्नीशियम और फलेवोनाईडस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो पेट से संबंधित समस्याओं से लड़ने में एक दवा की तरह काम करता है। इसे खाने से पाचन प्रणाली भी अच्छी रहती है तथा गर्मियों में आपके दिल की भी देखभाल करता है।

    मिंट आईस टी
    -पुदीने की साथ आईस टी पीने से चाय की जो गर्माहट होती है वह कम हो जाती है। क्योंकि पुदीना शरीर को ठंडा करता है। पुदीने की पत्तियां गर्म पानी में उबाल लें और फिर आईस टी बनाते वक्त उसमें डाल दें। इसे बनाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह शरीर को सिर्फ ठंडक ही नहीं पहुंचाता बल्कि मिंट से पेट से संबंधित समस्याएं भी कम होती हैं।

    मौसमी का जूस
    -यह विटामिन सी, आयरन, पोटैशियम, कॉपर आदि का अच्छा स्त्रोत है। मौसमी का जूस स्किन, पिंपल, बदहजमी, कब्ज जैसी समस्याओं से आराम दिलाने में सहयोगी है। विटामिन सी की प्रचुरता से ये स्कर्वी-मसूड़ों में खून का आना जैसी बीमारी को नियंत्रित करने में सहयोग करता है।

    तरबूज का जूस
    -तरबूज लाइकोपीन का बहुत अच्छा स्त्रोत है। यह एक एंटीऑक्सीडेंट है जो फ्री रेडिकल्स को कम करने में मदद करता है। इसके जूस से किडनी से संबंधित रोग नहीं होता साथ ही साथ पथरी को भी बढ़ने से रोकता है और स्किन के लिए भी फायदेमंद है। तरबूज में काफी मात्रा में पानी पाया जाता है जो कि शरीर के लिए लाभदायक है।

    फूलो की खेती में सामयिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में फूलो की खेती में सामयिक सुझाव जारी किया है। इस समय लॉकडाउन के कारण फूलो की खेती में किसानों को बाजार के अभाव में काफी परेशानी हो रही है। फिर भी इसकी उपयोगिता और लाभ देखते हुये सामायिक सस्य क्रियाओं को करना आवश्यक है। रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ गौरव शर्मा ने फूलों की खेती हेतु समसामयिक सलाह दी है कि लॉकडाऊन के कारण गेंदा के जो फूल लगें रह गए हों उन्हे बीज के लिए अब छोड़ दें। जो फूल नहीं बिके उन्हे छांव में सुखाएँ एवं हो सके तो प्राकृतिक रंग या खाद के लिए उपयोग में लें। ग्रीष्म कालीन गेंदे के लिए नर्सरी की तैयारी करें। ग्लेडिओलस के कंद को मिट्टी से निकालने का उपयुक्त समय है। अगर लॉकडाऊन के कारण कोल्ड स्टोरेज में पहुंचाने में दिक्कत हो तो एक बार सिंचाई कर दें। सेवन्ति (गुलदाउदी) में उसके तने के पास से निकलने वाली सकर्स को अलग कर लगा दें। अगर अभी अलग नहीं किया है तो फिर पौधों में नाइट्रोजन वाले खाद को डालें। गुलाब में पाऊड्री मिलड्यू फफूंद जनित बीमारी के बचाव हेतु 0.02 प्रतिशत बाविस्टीन फफूंद नाशक का प्रयोग करें। ग्रीष्मकाल में खेत खाली होने पर मिट्टी परीक्षण हेतु खेत से मिट्टी के नमूने लें। गर्मी के फूलों जैसे जीनिया, पोर्चुलाका व कोचिया के पौधों की सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई कर दें।

    पशुपालकों एवं दूध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में पशुपालकों एवं दुग्ध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। इस समय कोविड-19 के विश्व व्यापी संक्रमण रोग की परिस्थिति में दुधारू पशुओ से जुड़े किसानों और दूध विक्रेताओं को सतर्क और सजग रहने की आवश्यकता हैं। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण सलाह डॉ संजीव कुमार एवं डॉ आशुतोष ने बताया कि कुछ बातों का मान पूर्वक अनुसरण करे। दूध विक्रेता अथवा पशुपालकों द्वारा विभिन्न ग्राहकों को दूध की आपूर्ति करते समय, बीच-बीच में अपने हाथों को सैनिटाइज करते रहना चाहिए या साबुन से नियमित अन्तराल पर हाथ धोते रहना चाहिए। एकत्र किये गए दूध को तुरंत साफ कपड़े से छानना चाहिए और इसे ठंडे स्थान में ढककर रखना चाहिए। यदि दूध को खुले में बेचा जाना है, तो इसे जल्द से जल्द ढके बर्तन व शीतल परिस्थितियों में उपभोक्ता खुदरा बाजार तक ले जाना चाहिए । यदि पैकिंग सुविधाएँ उपलव्ध हैं, तो दूध की पैकिंग और पैक किये गए दूध की विक्री को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । यदि संभव होतो ऑनलाइन लेन देन हेतु उपयुक्त संसाधन का उपयोग करे और नगद भुगतान से बचें। बीमार महसूस होने पर दूध या दूध के प्रसंस्करण के कार्यों में शामिल न हों।दूध बेचते समय विक्रेता को हाथो में हर समय दस्ताने पहनने चाहिए परन्तु ये नहीं समझे कि दस्ताना पहनना हाथ धोने का विकल्प है। अतः दूध विक्री के दौरान भी नियमित अंतराल पर हाथ धोना अनिवार्य है। उपयोग पश्चात उचित रूप से दस्ताने और मास्क निकले और उन्हें सुरक्षित रूप से ढक्कन युक्त कचरे के डब्बे में डाल दें। घर पर बनाये गए मास्क को दोबारा उपयोग से पहले अच्छी तरह धो कर सुखा लेना चाहिए । दूध मापने हेतु लंबे हैंडल वाल बर्तन का प्रयोग करें, यदि बीच-बीच में आपने किसी और भी चीज को छुआ हो तो हाथों को साफ करने के बाद ही पुनः इसे छुएं। दूध बेचने वाले व्यक्ति को पूर्ण (फुल) आस्तीन वाली कमीज पहननी चाहिए एवं अन्य व्यक्ति से सुरक्षित दुरी (कम से काम 6 फीट) से बनाकर रखे । कार्य के बाद वापस घर आने पर तुरंत कपड़े हटादें और उन्हें धो ले। परिवार के किसी सदस्य विशेषकर बुजुर्गो और बच्चों के साथ बातचीत करने से पहले स्नान करे । घर के बाहर जूते निकले और उन्हें अलग रखें।दूध वितरण को इस तरह से नियमित करे कि जिनसे मानव संपर्क न्यूनतम हो, जैसे कि एक क्षेत्र में दो दिनों में एक बार पहुंचाना। दूध और दूध उत्पादों का वितरण हेतु उत्पाद को क्रेता के दरवाजे पर छोड़कर या कम से कम 6 फीट के अंतर को बनाए रखे ताकि मानव संपर्क से बचाजा सके। घरों में ज्यादा स्पर्श बिन्दुओ जैसेकी दरवाजे की घंटी, उनके हैंडल आदि से संपर्क से बचा जाना चाहिए और यदि संपर्क में आते हैं तो हाथ अच्छी तरह से साफ किया जाना जाना चाहिए । बिक्री काउंटर पर मास्क और दस्ताने पहनें और ग्राहकों से सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए कहें। यदि दूध या दूध उत्पादों को वितरित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला वाहन हॉट स्पॉट के रूप में चिन्हित क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो इसे दूसरे उपयोग से पहले अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए। कोविद -19 से खुद को बचाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किये गए दिशा-निर्देशों का पालन करें।

    फूलो की खेती में सामयिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में फूलो की खेती में सामयिक सुझाव जारी किया है। इस समय लॉकडाउन के कारण फूलो की खेती में किसानों को बाजार के अभाव में काफी परेशानी हो रही है। फिर भी इसकी उपयोगिता और लाभ देखते हुये सामायिक सस्य क्रियाओं को करना आवश्यक है। रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ गौरव शर्मा ने फूलों की खेती हेतु समसामयिक सलाह दी है कि लॉकडाऊन के कारण गेंदा के जो फूल लगें रह गए हों उन्हे बीज के लिए अब छोड़ दें। जो फूल नहीं बिके उन्हे छांव में सुखाएँ एवं हो सके तो प्राकृतिक रंग या खाद के लिए उपयोग में लें। ग्रीष्म कालीन गेंदे के लिए नर्सरी की तैयारी करें। ग्लेडिओलस के कंद को मिट्टी से निकालने का उपयुक्त समय है। अगर लॉकडाऊन के कारण कोल्ड स्टोरेज में पहुंचाने में दिक्कत हो तो एक बार सिंचाई कर दें। सेवन्ति ;गुलदाउदीद्ध में उसके तने के पास से निकलने वाली सकर्स को अलग कर लगा दें। अगर अभी अलग नहीं किया है तो फिर पौधों में नाइट्रोजन वाले खाद को डालें। गुलाब में पाऊड्री मिलड्यू फफूंद जनित बीमारी के बचाव हेतु 0ण्02 प्रतिशत बाविस्टीन फफूंद नाशक का प्रयोग करें। ग्रीष्मकाल में खेत खाली होने पर मिट्टी परीक्षण हेतु खेत से मिट्टी के नमूने लें। गर्मी के फूलों जैसे जीनियाए पोर्चुलाका व कोचिया के पौधों की सिंचाई एवं निराई.गुड़ाई कर दें।

    पशुपालकों एवं दूध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में पशुपालकों एवं दुग्ध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। इस समय कोविड.19 के विश्व व्यापी संक्रमण रोग की परिस्थिति में दुधारू पशुओ से जुड़े किसानों और दूध विक्रेताओं को सतर्क और सजग रहने की आवश्यकता हैं। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण सलाह डॉ संजीव कुमार एवं डॉ आशुतोष ने बताया कि कुछ बातों का मान पूर्वक अनुसरण करे। दूध विक्रेता अथवा पशुपालकों द्वारा विभिन्न ग्राहकों को दूध की आपूर्ति करते समयए बीच.बीच में अपने हाथों को सैनिटाइज करते रहना चाहिए या साबुन से नियमित अन्तराल पर हाथ धोते रहना चाहिए। एकत्र किये गए दूध को तुरंत साफ कपड़े से छानना चाहिए और इसे ठंडे स्थान में ढककर रखना चाहिए। यदि दूध को खुले में बेचा जाना हैए तो इसे जल्द से जल्द ढके बर्तन व शीतल परिस्थितियों में उपभोक्ता खुदरा बाजार तक ले जाना चाहिए । यदि पैकिंग सुविधाएँ उपलव्ध हैंए तो दूध की पैकिंग और पैक किये गए दूध की विक्री को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । यदि संभव होतो ऑनलाइन लेन देन हेतु उपयुक्त संसाधन का उपयोग करे और नगद भुगतान से बचें। बीमार महसूस होने पर दूध या दूध के प्रसंस्करण के कार्यों में शामिल न हों।दूध बेचते समय विक्रेता को हाथो में हर समय दस्ताने पहनने चाहिए परन्तु ये नहीं समझे कि दस्ताना पहनना हाथ धोने का विकल्प है। अतः दूध विक्री के दौरान भी नियमित अंतराल पर हाथ धोना अनिवार्य है। उपयोग पश्चात उचित रूप से दस्ताने और मास्क निकले और उन्हें सुरक्षित रूप से ढक्कन युक्त कचरे के डब्बे में डाल दें। घर पर बनाये गए मास्क को दोबारा उपयोग से पहले अच्छी तरह धो कर सुखा लेना चाहिए । दूध मापने हेतु लंबे हैंडल वाल बर्तन का प्रयोग करेंए यदि बीच.बीच में आपने किसी और भी चीज को छुआ हो तो हाथों को साफ करने के बाद ही पुनः इसे छुएं। दूध बेचने वाले व्यक्ति को पूर्ण ;फुलद्ध आस्तीन वाली कमीज पहननी चाहिए एवं अन्य व्यक्ति से सुरक्षित दुरी ;कम से काम 6 फीटद्ध से बनाकर रखे । कार्य के बाद वापस घर आने पर तुरंत कपड़े हटादें और उन्हें धो ले। परिवार के किसी सदस्य विशेषकर बुजुर्गो और बच्चों के साथ बातचीत करने से पहले स्नान करे । घर के बाहर जूते निकले और उन्हें अलग रखें।दूध वितरण को इस तरह से नियमित करे कि जिनसे मानव संपर्क न्यूनतम होए जैसे कि एक क्षेत्र में दो दिनों में एक बार पहुंचाना। दूध और दूध उत्पादों का वितरण हेतु उत्पाद को क्रेता के दरवाजे पर छोड़कर या कम से कम 6 फीट के अंतर को बनाए रखे ताकि मानव संपर्क से बचाजा सके। घरों में ज्यादा स्पर्श बिन्दुओ जैसेकी दरवाजे की घंटीए उनके हैंडल आदि से संपर्क से बचा जाना चाहिए और यदि संपर्क में आते हैं तो हाथ अच्छी तरह से साफ किया जाना जाना चाहिए । बिक्री काउंटर पर मास्क और दस्ताने पहनें और ग्राहकों से सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए कहें। यदि दूध या दूध उत्पादों को वितरित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला वाहन हॉट स्पॉट के रूप में चिन्हित क्षेत्र में प्रवेश करता हैए तो इसे दूसरे उपयोग से पहले अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए। कोविद .19 से खुद को बचाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किये गए दिशा.निर्देशों का पालन करें।

    मई माह में वन पौधशाला हेतु सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में वन पौधशाला के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिकगण डा.ॅ पंकज लवानिया तथा डॉ. पी.पी. जाम्बोलकर ने सलाह दी है कि पौधशाला में पौधों की सिचाई सुबह 9 बजे से पहले या शाम को 5 के बाद करनी चाहिए। दोपहर के समय तापमान अधिक होने कारण बाष्पीकरण की दर अधिक होती है। बाष्प पौधों की पत्तियों के लिए नुकसानदायक होती है। पौधशाला में कम से कम दिन में एक बार सिचाई अवश्य करें। जिससे नवजात पौधों को उच्च तापमान के प्रभाव से बचाया जा सके। पौधशाला में छायाजाल (ग्रीनशेडनेट - ७५) द्वारा छाया प्रबंधन सुनिश्चित करें, जिससे बाष्पीकरण की दर को कम कर, मृदा नमी को बचाया जा सके। काला सिरिस, सफेद सिरिस, गुलमोहर, देशी बबूल आदि में बीजों द्वारा प्रवर्धन करें। पिछले वर्ष लगे फौधों का क्यारियों को परिवर्तित कर दे, जिससे पौधों की जड़ें जमीन को न पकड़ें। स्थान परिवर्तित करते समय, उचित छाया व नमी पर विशेष ध्यान दे, और थालियों में लगे पौधों को तुरंत पानी दे। ग्रीष्मकाल में पानी की कमी के कारण दीमक का प्रकोप बढ़ जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप पौधे मरने लगते है।इस स्थिति से पहले ही क्लोरोपाइरीफास नामक दवा का उचित मात्रा (१.५-२.०मि.ली. लीटर) का घोल बनाकर क्यारी को उपचारित करे।

    बुंदेलखंड में मई मे आम के कृषि संबंधी कार्य

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में आम उत्पादको के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिक डॉ रंजीत पाल ने बताया कि मई के महीने में आम के पौधे से फल का गिरना एक बहुत बड़ी समस्या होती है। इसके रोकथाम के लिए नैफ्थलीन एसीटिक ऐसिड (एनएए 20 पीपीएम - यानी 2 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) की दर से छिड़काव करना चाहिए। सूक्ष्म तत्व (जिंक, कापर, मैंगनीज, आयरन, बोरॉन इत्यादि) के मिश्रण को 2 एमएल/लीटर की दर से 2-3 बार छिड़काव जब फलमार्बल अवस्था पर हो तब10-12 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। दीमक प्रबंधन के लिए क्लोरोफाइरिफास (200 मि.ली. प्रति100 लीटर पानी) का उपयोग करना चाहिए। मई के महीने में जो भी फूल गुच्छा/गुम्मा रोग दिखाई दे उसको एक तेज धारदार तथा रासायन से उपचारित चाकू से काटना चाहिए तथा मिट्टी मे दबा देना चाहिए। आम मे फलों के विकास के लिए मई का महीना सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि ग्रीष्म ऋतु मे शुष्कता तथा जल की समस्या होती है जिससे फलों का विकास पूर्ण रूप से नहीं हो पता है। तथा इसीलिए जब फल मटर से मार्बल का आकार के दाने के आकार का हो तो सिचाई कि शुरुआत कर देनी चाहिए तथा 6-7 दिन के अंतराल पर नियमित देते रहना चाहिए। यदि आम चूषक कीट दिखाई पड़े तो क्लोरोपाइरिफास (1 एम एल प्रति 1 लीटर) अथवा डाईमेथोएट (0.5 मि.ली ) का पर्णीय छिड़काव कर देना चाहिए। फ्रूट फली ट्रेप (जाल) (यूजनोल/0.1 प्रतिशत़$़ मेलाथियान/0.1 प्रतिशत ) को आम के बगीचे मे जगह जगह टांग कर फल मक्खी को नियंत्रित करना चाहिए । आम के फलों मे कायिक विकार जैसे ब्लैक टिप और अंदरूनी ऊतक की समस्या भी देखने को मिलती है खासकर के उन क्षेत्रों मे जहां ईट के भट्टे पाए जाते है। अतः, इसके नियंत्रण के लिए बोरैक्स (1 किग्रा प्रति 100 लीटर पानी) का छिड़काव मई के प्रथम या द्वितीय सप्ताह मे करना चाहिए। तना भेदक तथा पत्ती काटने वाले कीट भी मई के महीने मे बहुतायत रूप से पाए जाए है जिसका नियंत्रण करना भी अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इसके नियंत्रण के लिए कार्बारिल (0.2ः) प्रतिशत अथवा मोनोक्रोटोफॉस (0.05ः) प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए। मई के महीने मे जीवाणु कैंकर रोग भी आम मे पाया जाता है। अतः उचित नियंत्रण करने के लिए स्ट्रेप्टोमाइसिन (200 पीपीएम अथवा 20 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए।

    बुंदेलखंड के किसानों को मई माह में "अमरूद"के कृषि कार्य

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में अमरूद उत्पादको के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिक डॉ रंजीत पाल ने बताया कि बरसात वाली फसल के लिए फूल आना मई के महीने में शुरू हो जाते है। बरसात वाली फसल गुणवत्ता पूर्ण नहीं होती है तथा बहुत से रोग और कीटों की भी समस्या पाई जाती है अतः इस ऋतु की फसल को न लेने के लिए फसल नियमन का उपयोग करते है।निम्नलिखित कारकों को अपनाकर बरसात वाली फसल से बचा जा सकता है ग्रीष्मकालीन फूलों को हाँथ से तोड़ देना चाहिए नए तनों की कटाई, 2 पत्ती तक अप्रैल-मई महीनों मे कर देने से अच्छा परिणाम मिलता है एनएए का दो स्प्रे, पहला 800 पीपीएम के दर से 50 प्रतिशत पुष्पन के दौरान तथा दूसरा छिड़काव पहली छिड़काव के 20 दिन के उपरांत करना चाहिए। यूरिया का छिड़काव 8-10 प्रतिशत के दर से भी करना चाहिए। सामान्यतः, पुष्पन के दौरान कीटनाशी दवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके उपयोग से परागण के धुलने तथा परागित करने वाले लाभदायक कीटों कि मरने की संभावना होती है। बोरान की कमी से पत्तियों का छोटा होना, फलों का फटना तथा फलों का कठोर होना जैसी समस्या पाई जाती है अतः इसकी कमी से बचने के लिए बोरैक्स/0.3 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।

    कद्दूवर्गीय फसल में सामयिक कीटों का प्रवंधन

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में कद्दूवर्गीय फसल उत्पादको के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिक डॉ. उषा मौर्या, डॉ. विजय कुमार मिश्रा और डॉ. मैमोम सोनिया ने बताया कि इस समय कद्दूवर्गीय फसलो में लाल कद्दू बीटल, चूसने वाले कीट, फल की मक्खी और हड्डा बीटल का प्रकोप बढ जाता है। लाल कद्दू बीटल के प्रकोप से बचने के लिए नवम्बर में खरीफ फसलो की कटाई के बाद खेतों की गहरी जुताई करें ताकि लाल कद्दू बीटल के छुपे हुए वयस्क नष्ट हो जाएँ। वर्तमान में खेत में दिख रहे लाल कद्दू बीटल के वयस्क को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। इसके अलावा मेलाथियान 50 ईसी / 500 मि.ली. या डाइमेथोएटे 30 ईसी / 500 मिली या मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी / 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। जब लाल कद्दू बीटल के वयस्क पौधों की पत्तियों पे दिखाई दें तब उन्हें मारने के लिए क्लोरपयेरीफोस 100 ग्राम ए. आई का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। पौधों का रस चूसने वाले कीटों की रोकथाम के लिए फसल की प्रारंभिक अवस्था में नीम सीड कर्नल एक्ट्रेक्ट 5 प्रतिशत का एक बार तथा 15 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव अवश्य करें। फल की मक्खी से ग्रसित फलों को एक गडढे में इकट्ठा करके नियमित रूप से नष्ट कर दें। सिरका और चीनी के घोल का प्रपंच की तरह प्रयोग करें। फल की मक्खी के प्यूपा को नष्ट करने के लिए पेड़ों की जड़ों में मेलाथियान 5 प्रतिशत डस्ट का २० किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। हड्डा बीटल से बचाव हेतु खेत की सफाई करें। इस कीट की रोकथाम हेतु 625 मि.ली. मेलाथियान 50 ईसी का 325 लीटर पानी के साथ घोल बनाकर छिड़काव करें और बीटल दोबारा दिखने पर 10 दिनों के बाद दोबारा छिड़काव करें

    ऊसर भूमि सुधार हेतु हरी खाद लगाऐं।

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में ऊसर भूमि सुधार हेतु किसानो के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिकगण डॉ योगेश्वर सिंह, डॉ अनिल कुमार राय डॉ सुशील कुमार सिंहने बताया ऊसर होती मिट्टी को बचाने के लिय मई माह मे किसान भाई ढैंचा की बुवाई कर। ऊसर भूमि वह होती है जिसकी मिट्टी का पी.एच. मान लगभग 8.5 के ऊपर जा रहा हो। ऐसी मिट्टी के लिए ढैचॉ एक उपयुक्त खाद है यह मिट्टी की क्षारीयता को कम करता है। जिन खेतों में मृदा सुधारक रसायन जैसे जिप्सम या पायराईट का प्रयोग हो चुका है और लवण निच्छालन की क्रिया सम्पन्न हो चुकी हो वहॉ ढैचॉ की हरी खाद लगाना चाहिये। हरी खाद वायुमंडलीय नत्रजन को मृदा में स्थिर करती है एवं मिट्टी में भौतिक, रसायनिक एवं जैविक क्रियाशीलता में वृद्धि लाती है साथ-साथ उत्पादकता एवं गुणवत्ताशील उपज प्राप्त करने में सहायक होती है। हरी खाद की सबसे प्रचलित विधि प्रथम है इसके लिए रबी की फसल काटने के बाद एवं खरीफ की फसल लगाने के पूर्व करीब 90 दिन का समय किसान भाइयो को मिलता है। इस समय अप्रैल, मई माह मे अगर खाली खेत मे पर्याप्त नमी लाकर 40-45 किलो ढैंचा बीज की बुवाई कर करके लगभग 45 दिन बाद ढैंचा को किसी मिट्टी पलटने वाले हल से मिट्टी मे दबा देने चाहिये। इससे धान की रोपाई या खरीफ फसल लगाने के पहले एक अच्छी हरी खाद तैयार हो जाती है। इसे मिट्टी मे दबाने के लगभग एक सप्ताह के बाद जब ढैचॉ सड़ जाये तब धान की रोपाई करनी चाहिये। ढैचॉ की जड़ें गहरी तथा मजबूत होने के कारण कम उपजाऊ भूमि में भी अच्छी उगती है। भूमि को पत्तियों एवं तनों से ढक लेती है जिससे मृदा क्षरण कम होता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थों की अच्छी मात्रा एकत्रित हो जाती है। राइजोबियम जीवाणु की मौजूदगी में ढैचॉ की फसल में 80-150 किग्रा० नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर स्थिर करने की क्षमता होती है। इससे मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में प्रभावी परिवर्तन होता है जिससे सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता एवं आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता में वृद्धि होती है।

    मई माह में कृषि वानिकी हेतु सलाह।

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में कृषि वानिकी के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। किसान भाई उद्देशीय वानिकी पौधे जैसे सागौन, शीशम, सहजन, कदम्ब, मिलिया, बबूल, आवला, बेल, खैर, महुआ, इत्यादि को खेतों की मेड व खेत के चारो तरफ, या खेतो में पक्ति फसल के साथ वर्षाकाल में लगाने की तैयारी करे। उपरोक्त पौधों की प्रजातियां वर्षाकाल में लगाने के लिए गडढो की खुदाई अव मई के प्रथम सप्ताह में शुरू कर दे। वृक्ष प्रजातियों के अनुसार गडढो का आकर एवं दूरी सुनिश्चित करें। सागौन और शीशम, नीम, मिलिया, और कदम्ब के लिये 60×60×60 से0मी0 जबकि सहजन, बबूल, और खेर के लिये 45×45×45 से0मी0 आयत के गडढे खोदना चाहिये। सागौन बबूल और खेर के लिये मेड़़ पर 3 मी0 और खेत पर 4 मी0 दूरी पर गडढे खोदना चाहिये। शीशम, नीम, मिलिया और कदम्ब के लिये मेड़़ और खेत दोनो स्थिति में 4 मी0 पर गडढे खोदना चाहिये। सहजन के गडढे मेड़़ पर 1 से 2 मीटर के दूरी पर खोदना चाहिये। यदि इन वृक्षो को खेत में लगाना हो तो सागौन के लिये 5 मी0, शीशम के लिये 4 मी0, अन्य वानिकी पौधो के लिये 6 मी0 पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर गडढो को रखना चाहिये। कृषि वानिकी प्रणाली में सामान्यता पौधे की पौधे से दूरी व पंक्ति से पंक्ति की दूरी इस प्रकार रखे कि कृषि उपकरण जैसे ट्रेक्टर आदि का आसानी से प्रयोग हो सके। मई माह में इन गडढो को सूर्य ताप से उपचारित होने के लिये छोड देना चाहिये।

    किसान उच्च गुणवत्ता के बीज खेती में प्रयोग करें।

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में उच्च गुणवत्ता के बीज किसानों को अपनाने के लिये समायिक सलाह जारी किया है। वैज्ञानिकगण डा. मनोज कुमार सिंह, डा. अशुमान सिंह और डा. विष्णु कुमार ने बताया कि बुन्देलखण्ड में किसान 95 प्रतिशत अपना बीज प्रयोग करते है जिससे सारी मेहनत के बावजूद उपज कम होती है। बेहतर फसल उपज के लिए उच्च गुणवत्ता के बीज लेने से लगभग 20 प्रतिशत उत्पादकता और उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है । ऐसे बीज में आनुवांशिक शुद्धता लगभग शत-प्रतिशत होती है, अन्य फसल एवं खरपतवार के बीजों से रहित होता है, रोग व कीट के प्रभाव से मुक्त होता है। इसमें शक्ति और ओज भरपूर होने से अंकुरण क्षमता उच्च कोटि की हाती है। जिससे खेत में जमाव और अन्ततः उपज अच्छी होती है। अतः किसान भाईयों से अनुरोध है कि प्रमाणित बीज प्राप्त कर अपने पुराने बीजों को बदलते हुए, बुवाई करें । किसान को चाहिए कि वे अपनी फसलों के बीज जैसे समस्त दलहनी, तिलहनी एवं धान्य फसलों का बीज एक से तीन वर्ष के बीच बदल कर बुवाई करें। कई बीमारियां हैं जो बीज के माध्यम से फैलती है। यदि संक्रमित बीजों का उपयोग अगली फसल के लिए किया जाता है, तो बीज जनित रोग खेत में स्थानांतरित हो जाते हैं। इसलिए बीज, स्वस्थ पौधों से प्राप्त करना चाहिए। यदि अपना बीज प्रयोग करना मजबूरी है तो स्वस्थ और पुष्ट बीज लेकरे इसे साफ करें फिर बोने से पहले इसका उपचार करें। खरीफ फसलों के लिए शोध में उपयोगी पाए गए जैविक एवं रासायनिक बीजोपचार, फसलों की संतुति के अनुसार अवश्य प्रयोग करें । इस समय रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी में मूगं, उड़द, अरहर, बाजरा, ज्वार, सांवा, कोदों और तिल के बुन्देलखण्ड के लिये उपयुक्त प्रजातियो के आधार एवं प्रमाणित बीज उपलब्ध है।

    सामयिक बरसात का लाभ उठाकर खेत की करें तैयारी

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में समायिक बरसात पर खेत की तैयारी पर सलाह जारी किया है। वैज्ञानिकगण डॉ योगेश्वर सिंह, डॉ सुशील कुमार सिंह एवं डा0 सौरभ सिंह ने बताया कि मई में कई जगहो पर बरसात हुयी है खेत में नमी आ चुकी है । किसानों को चाहिये कि इसका लाभ उठाकर गर्मी की गहरी जुताई तुरन्त कर दें । इससे मिट्टी में वायु संचार होता है, भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है और धूप में खुला खेत होने से खरपतवार नष्ट हो जाते है और कई बीमारियों एवं कीडे़ का प्रकोप खरीफ की फसलों पर नही होता है । जब 20 से0मी0 से ज्यादा गहरी जुताई हो तो उसे गहरी जुताई कहते है । अन्य जुताईयां गर्मी की जुताई कहलाती है । इसके अलावा वो किसान भाई जिनके खेत ऊसर हो गये है वो किसान ऊसर क्षेत्र का चयन कर उसमें मृदा सुधारक रसायन का प्रयोग करें । गर्मी में भूमि सुधार का यह काम जरूर करना चाहिए । सर्वप्रथम खेत के चारों तरफ मेड़बन्दी करें एवं मेड़बन्दी का कार्य पूरा हो जाने के पश्चात मृदा परीक्षण परिणाम की संस्तुति के अनुसार मृदा सुधारक (पायराइट/जिप्सम) का प्रयोग किया जाये । खेतों में जिप्सम डालने एवं इसे फैलाने के बाद तुरन्त कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 10-15 से0मी0 की सतह में मिला दें । तत्पश्चात खेत को समतल कर पानी भर कर के रिसाव क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये । पहले खेत में 12-15 से0मी0 पानी भरकर छोड़ देना चाहिये । 7-8 दिनों बाद जो पानी बचे उसे जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर पुनः 12-15 से0मी0 पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए ।

    कीमती अनाजों (गेंहू) को देशी विधि से भी भण्डारित कर बचा सकते है।

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह ने बताया कि कटाई उपरान्त् भण्डारित अनाजों को देशी विधि से कैसे बचा सकते है। बुन्देलखण्ड के किसानों के लिए सामायिक सलाह जारी की गई है। वैज्ञानिक डॉ. विजय कुमार मिश्रा, डॉ. उषा और डॉ. एम0 सोनिया देवी ने बताया कि आज कल मडाई के बाद अनाजों को भण्डारित करने की प्रक्रिया चल रही है। इसमें सबसे पहले हमारे किसान भाई भंडार गृह को अच्छी तरह से साफ कर ले और फिर भंडार गृह को धूएँ से उपचारित करें। भंडारित करने वाले अनाज को सूरज की कड़ी रोशनी में तब तक सुखाएँ। सुरक्षित भण्डारण हेतु अनाज फसलों के लिये 13 प्रतिशत दलहनी फसलों के लिये 14-15 प्रतिशत नमी पर भण्डारण करना चाहिये अन्यथा कीडों का प्रकोप बहुत बढ जाता है। कुछ देशी विधियॉ से अनाज को उपचारित कर इन्है सुरक्षित रखा जा सकता है जैसे- नीम की पत्तियों को सूखा कर नमक और सरसों के तेल में मिला कर (250 ग्राम नीम की पत्तियॉ, 200 ग्राम नमक और 50 ग्राम सरसों तेल) आपस में मिश्रित करके पर 1 क्विंटल अनाज मिश्रित करके भंडारण में रख दे दूसरा तरीका है कि नीम की पत्ती, गोट खरपतवार की पत्ती एवं लहसुन 2ः1ः1 अनुपात में सूखा कर मिश्रण तैयार करें। इस मिश्रण में 500 मि0ली0 सरसों अथवा 50 मि0ली0 अरण्डी अथवा अलसी का तेल मिलाएँ। यह मिश्रण 1 क्विंटल अनाज को उपचारित कर भण्डारण के लिए पर्याप्त है। इस विधि से अनाज उपचारित कर कीट पतंगों से अनाज को बचा सकतें है।

    खरीफ फसलो में बुआई पूर्व करें बीजोपचार

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस िंसंह के निर्देशन मे वैज्ञानिकों ने किसानों को अपने सुझाव दिये जिसमें वैज्ञानिक डॉ प्रशांत जाम्भुलकर. डॉ वैभव सिंह, डॉ सुनैना सिंह ने आगामी खरीफ मौसम में बुंदेलखंड में तिलहनी (सोयाबीन, मूंगफल्ली, तिल), दलहनी (उड़द, मुंग, अरहर), अनाज (धान, मक्का, ज्वार), मोटे अनाज (बाजरा, रागी), कपास और गन्ना जैसी फसलें प्रमुख रूप से उगायी जाती हैं। इनमे आने वाली रोगों के उपचार के लिए बुआई से पूर्व बीजोपचार करना अनिवार्य रूप से आवश्यक है, जो मृदा एवं बीज जनित रोगों के रोकथाम के लिए सहायक हैं। इसके उपचार के लिए किसान थिरम या कार्बेन्डाजिम या कॅप्टन कवक नाशकों को उपलब्धता के अनुसार, २ ग्राम प्रति किलोग्राम बीजों में प्रयोग करें। बीजोपचार हेतु बीजोपचार ड्रम का उपयोग करें। सबसे पहले बीज को तोलकर ड्रम में डालें। आवश्यक मात्रानुसार दावा को बीज के ऊपर डालें तथा ड्रम को लगातार हिलाएं जब तक दावा पूरी तरह से बीज में चिपक न जाये। दलहनी फसलो में विषाणु रोग नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रीड 600 नामक कीटनाशक का 1.5 मिली लीटर प्रति किलोग्राम बीज में प्रयोग करें। अक्सर गन्ने में लाल सडन रोग हो जाता है जिसके निवारण हेतु घेडी (बोने हेतु कटे हुए गन्ने के तने के टुकडें) का उपचार 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति लीटर पानी के घोल में 4 घंटे डूबा कर रखें तथा अतिरिक्त पानी निथरने के लिए छाया में रखें ।

    उत्पादित फल और सब्जियों को खराब होने से कम खर्च में कैसे बचाये

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के निर्देशन मे वैज्ञानिकों डॉ घनश्याम अबरोल, डॉ अमित कुमार, डॉ अजय पांडेय (अधिष्ठाता उद्यानिकी एवं वानिकी) ने बताया कि कोरोना संकट काल के इस समय में जो किसान भाई अपनी ऊपज को बेच नहीं पा रहे हैं या अपने पास रखने के लिए मजबूर हैं, ऐसे किसान भाइयों को शून्य ऊर्जा शीतकक्ष का इस्तमाल करने की सलाह देना चाहूंगा। गर्मियों के दिन आ गए हैं इस समय फल एवं सब्जियाँ बहुत जल्दी खराब होने लगती है जिसका कारण तापमान की अधिकता और कम आर्द्रता का होना है। चूँकि किसान भाइयों के पास भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं होती है इसलिए ऐसे समय में जीरो एनर्जी कूल चैम्बर (शून्य ऊर्जा शीतकक्ष) एक सबसे सस्ता उपाय है। किसान भाई इसे अपने घर में स्वयं ही बना सकते है। यह एक दोहरे ईंट-दीवार की संरचना है, जिसके रिक्त स्थान को रेत से भरा जाता है। इसका निर्माण बहुत ही सरल है और इसमें किसी विशेष कौशल की आवश्यकता नहीं होती है। कूल चेंबर्स 10-15 प्रतिशत तक तापमान कम कर सकते हैं और लगभग 95 प्रतिशत की उच्च आर्द्रता बनाए रख सकते हैं जो फल और सब्जियों को अधिकतम समय तक ताजा बनाये रखने में सक्षम है। इसके निर्माण में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, किसानों के लाभ के लिए 100 प्रतिशत अनुदान देता है। इसे संचालित करने के लिए किसी बिजली की आवश्यकता नहीं होती है और आसानी से ईंट, रेत, बांस आदि से बनाया जा सकता है। इसके निर्माण के लिए एक छायादार क्षेत्र चुने जो की आस पास की भूमि से ऊंचाई पर हो और हो सके तो एक नजदीकी जल स्रोत हो। ईंट के साथ 165 सेमी 115 सेमी0 का फर्श बनाये और इसके ऊपर 7.5 सेमी0 का अंतराल छोड़कर 67.5 सेमी की ऊंचाई तक दोहरी दीवार का निर्माण करें साथ ही छोड़े हुए अंतराल में रेत भरे। इसे ढकने के लिए एक बांस का (165 सेमी0 115 सेमी0) फ्रेम का पुआल या सूखी घास के साथ बनाये। इस पूरी सरंचना को ढकने के लिए किसान भाई घास या फिर टिन शेड को सीधे धूप या बारिश से बचाने के लिए बना सकते हैं। शोध में पाया गया है की यह शीतकक्ष केले को 20 दिन, किन्नौ को 60 दिन, भिंडी को 6 दिन, गाजर को 12 दिन, आलू को 97 दिन और गोभी को 12 दिन तक सरंक्षित रख सकते है जबकि सामन्यतः केले को 14 दिन, किन्नौ को 14 दिन, भिंडी को 1 दिन, गाजर को 5 दिन, आलू को 46 दिन और गोभी को 7 दिन तक सरंक्षित रख सकते है।

    कोरोना काल में प्रतिरोधक क्षमता बढानें हेतु मसालेदार स्क्वाश का उपयोग करें

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के निर्देशन मे वैज्ञानिकों ने बताया कि इस कोरोना काल एवं भीषण गर्मी में रोग प्रतिरोधक एवं पाचन क्षमता बढानें के लियें मसालेदार स्क्वाश का उपयोग करना चाहिए जिसे सभी आसानी से घर में बना सकते हैं। यह पेय विटामिन, पोषक तत्वों, एंटीऑक्सिडेंट और रोगाणु रोधी से भरपूर होता है। इसके निर्माण में घर पर आसानी से मिलने वाले मसालों और जड़ी बूटियों का इस्तेमाल होता है जैसे कि चीनी, अदरक, काली मिर्च, पुदीना का अर्क, बड़ी इलायची और जीरा। इसे बनाने के लिए नीबूँ का इस्तेमाल करते हैं जो कि विटामिन बी से भरपूर होता है इसलिए यह पेय औषधीय और चिकित्सीय मूल्यों से भरपूर है। डॉ घन श्याम अबरोल, डॉ अमित कुमार, डॉ अजय कुमार पांडेय ने बताया कि इसके निर्माण के लिए ताजे परिपक्व और ठोस फलों का ले। ताजे पानी में अच्छी तरह से धोएं और स्टेनलेस स्टील के चाकू से दो भागों में काटिये और रस निकल कर छान कर 400 मि. ली. रख ले। चीनी (1.6 किलो ग्राम) की चाशनी बना कर सभी मसलों को पुदीने का रस 20 मि. ली., सफेद नमक 25 ग्राम, कला नमक 15 ग्राम, सौंठ, अदरक का रस 5 ग्राम, जीरा 10 ग्राम, बड़ी इलायची 4 ग्राम और काली मिर्च 10 ग्राम डाल कर अच्छे से उबाल ले और ठण्डा होने पर नीबूँ रस मिलाये। इसे बना कर फ्रिज में रख ले। अब इसके उपयोग के लिए एक भाग (मसालेदार स्क्वाश) एपिटाइजर में तीन भाग पानी मिलाऐं। यह पेय पदार्थ बच्चों से ले कर बड़े लोगों के लिए बहुत ही उपयोगी रहेगा ये न केवल पाचन क्षमता बढ़ाने में लाभदायक सिद्ध होगा अपितु प्रतिरोधक तंत्र को बढ़ाने में भी सक्षम है।

    फलों को सुरक्षित पकाऐं

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने फलों के पकाने पर सलाह जारी किया है। डॉ रंजीत पाल डॉ आशुतोष शर्मा , डॉ संजीव कुमार ने बताया कि इस समय बुन्देलखण्ड में पके आम बाजार में आना शुरू हो गये है। इसमें ज्यादातर स्वास्थय के दृष्टि से काफी आम असुरक्षित होते है। सुरक्षित तकनीकों को अपनाकर स्वास्थयवर्धक आम बाजार में भेजा जा सकता है। कुछ तकनीके निम्नलिखित है।
    ● साधारण तकनीक के अनुसार एक हवा अवरोधी वर्तन के अंदर कुछ पके हुए फलों को पकने वाले फलों के साथ रखें । पहले से ही पकने वाले फल एथिलीन को छोड़ते हैं, इसलिए अपने आप फलो का पकना तेज होगा।
    ● फलों को हवा अवरोधी कक्ष के अंदर पकने के लिए रखा जाए और कक्ष में धुआं किया जाये. धुआं एसिटिलीन गैस का उत्सर्जन करता है। कई फल व्यापारी इस तकनीक का पालन करते हैं, खासतौर पर केले और आम जैसे खाद्य फलों में एकसमान पकने के लिए। लेकिन इस पद्धति का मुख्य दोष यह है कि फल एक समान रंग और स्वाद प्राप्त नहीं करते हैं। इसके अलावा, उत्पाद पर धुएं की गंध इसकी गुणवत्ता को बाधित करती है
    ● एक सप्ताह के लिए धान की भूसी या गेहूं के भूसे के ऊपर फल फैलाना कर भूसे से ही ढकने से भी फल पक जाते हैं
    ● कुछ किसान 0.1 प्रतिशत ईथरल (1 लीटर पानी में 1 मिलीलीटर) के घोल में परिपक्व फलों को डुबोते हैं और इसे सूखा पोंछते हैं। तब एक दूसरे को छूने के बिना फल को अखबार में फैलाते हैं और एक पतली सूती कपड़ा इस पर कवर किया जाता है। इस विधि में, फल दो दिनों के भीतर पक जाएंगे। लेकिन खाद्य सुरक्षा और मानक नियमों के अनुसार ईथरल का फलों से स्पर्श वर्जित है.
    ● एक सरल और हानिरहित तकनीक में, 10 मिली लीटर ईथरल और 2 ग्राम सोडियम हाइड्रॉक्साइड को एक चौड़े मुंह वाले बर्तन में पांच लीटर पानी में मिलाया जाता है। इस बर्तन को फलों और कमरे के पास पकने वाले कक्ष (वायु रोधी) के अंदर रखा जाता है। कमरे का लगभग एक तिहाई हिस्सा हवा के संचलन के लिए शेष क्षेत्र को छोड़कर फलों से भरा होता है। फलों को 12 से 24 घंटों के लिए इस कक्ष में रखा जाता है। रसायन की लागत को कम करने के लिए, इथाइलीन उत्सर्जन करने वाले फल जैसे पका पपीता और केला जैसे फल भी उसी कमरे में रखने से फल जल्दी पक जाते हैं ।
    ● कुछ आम के व्यवसायी ज्यादा मुनाफे और जल्द बेचने के लालच में कच्चे आम को पकाने के लिए औद्योगिक ग्रेड कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल करते हैं जो सस्ता होने के साथ साथ बाजार में आसानी से उपलब्ध है. औद्योगिक ग्रेड कैल्शियम कार्बाइड में आमतौर पर आर्सेनिक, सीसा और फॉस्फोरस के अवशेष होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हो सकता है. आम पकाने के उद्देश्य के लिए कैल्शियम कार्बाइड का उपयोग भारत सहित अधिकांश देशों में अवैध है।
    ● आम पकाने के कक्ष में एथिलीन गैस का आम पकाने के उपयोग सुरक्षित और दुनिया भर में स्वीकृत विधि है. एथिलीन गैस के कैन से स्प्रे भी 24-48 घंटों में फल पकने को बढ़ावा देता है. एथिलीन एक प्राकृतिक हार्मोन होने के कारण फलों के उपभोक्ताओं के लिए कोई स्वास्थ्य खतरा नहीं है। यह एक डी-ग्रीनिंग एजेंट है, जो छिलके को हरे रंग से परिपूर्ण पीले (केले के मामले में) में बदल सकता है और फलों की मिठास और सुगंध को बनाए रख सकता है, इस प्रकार फल में मूल्यवर्धन संभव है क्योंकि यह अधिक आकर्षक लगता है तथा पूर्णतया सुरक्षित है

    बुंदेलखण्ड में शुष्क टिड्डी दल के आक्रमण से बचाव कैसे करें

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में बुंदेलखण्ड में शुष्क टिड्डी दल के आक्रमण से बचाव हेतु सामायिक सलाह जारी किया है। बुंदेलखण्ड में दिनांक 22 मई 2020 को हुये टिड्डी दल के आक्रमण को देखा गया है, टिड्डी दल पाकिस्तान से भारतीय सीमाओं को लाघते हुये पंजाब, राजस्थान और बुंदेलखण्ड के क्षेत्रों में भी सभी प्रकार की फसलों तथा पेड़ पौधों को नुकसान पहुॅचा दिया है। टिड्डी दल हमेशा झुण्ड में आक्रमण करती है तथा बहुभक्क्षी प्रकृति की होती है और सभी फसलों को चट कर जाती है जिनसे भीषण नुकसान होता है। टिड्डियों की संख्या 1 वर्ग किलोमीटर में 4 से 8 करोड़ तक होती है। यह 5 से 150 किलोमीटर की रफ्तार से प्रतिदिन उड़ सकते है। रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डा0 ऊषा, डा0 सुन्दर पाल, डा0 एम0 सोनिया देवी व डा0 विजय कुमार मिश्रा ने टिड्डी दल के प्रबन्धन के सुझाव दिया। टिड्डी दल का आक्रमण खेतों में होने पर किसान भाइयों को उनके पास स्टील या टीन के खाली डिब्बों को जोर से पीटकर आवाज करने से टिड्डी दल को भगाया जा सकता है। किसान भाई टिड्डी दल को अपने खेतों से भगाने के लिए 5 मीटर लम्बे बांस के डण्डें पर 3ग2 मीटर आकार का सफेद कपड़ा बांधकर लहराने से भी इनको भगाया जा सकता है। खेतों में सूखा चारा या भूसा जलाकर धुआं करने से टिड्डी दल स्वंय खेत को छोड़कर भाग जाते हैं। जो टिड्डियां खेतों में रह जाती है उनको इक्कठा करके नष्ट कर देना चाहिये। अपने खेतों के चारो तरफ 2 फुट गहरी और 2 फुट चौड़ी आकार की खाईयां खोदे और आक्रमण के बाद जो टिड्डियां खाई में गिर जाती है उनको मिट्टी से दबा देना चाहियें। टिड्डियों को मारने के लिए किसान भाई पेरिस ग्रीन का जहर चारा प्रयोग करें। टिड्डी दल के नियंत्रण के लिये नीम की निबोरी के रस का 5 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें। रासायनिक उपचार जैसे साइपर मैथरीन 25 ईसी की 25 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर या डेल्टामैथ्रिन 28 ईसी या लैम्डासायहैलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी की 2.5 मि0ली0 दवा का प्रति लीटर पानी में घोलकर या हाई वोल्यूम स्प्रेयर से छिड़काव करें।

    बुंदेलखंड क्षेत्र मे मूँगफली की कम लागत की उत्पादन तकनीक

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झाँसी के कुलपति डॉ अरविंद कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन मे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिये मूँगफली की कम लागत वाली उत्पादन तकनीक किसानो को अपनाने के लिए सामयिक सलाह जारी की गई है। जैसा कि ज्ञात है इस क्षेत्र में सर्वाधिक मूँंगफली की फसल किसान पैदा करते हैं मूँगफली की तकनीक को वैज्ञानिकगण डॉ निशांत भानु, डॉ मनोज सिंह और डॉ विष्णु कुमार ने बताया की बुंदेलखंड क्षेत्र मे यदि किसान मूँगफली के उन्नत प्रजाति जैसे सी एस एम जी 2003-19, टी 28,टी 64, जे जी 3, डी आर जी 17, टी जी 37।, जी 201, झुनकु, इंदौरी के साथ साथ उन्नत फसल पद्धति को अपनाते है तो किसान कम लागत मे अधिक पैदावार, भूमि सुधार और आर्थिक स्थिति में भी सुधार ला सकते हैं। इसके लिए किसानों को चाहिए की वो अधिक गुणवत्ता वाली बीजों का चयन करें। इससे बीज की लागत कम एवं अंकुरण ज्यादा होती है। अच्छी उपज के लिए बीज की बुवाई सदैव उचित गहराई मे करनी चाहिए। इसलिए बुवाई के समय यह ध्यान रखे की बीज की गहराई 5-7 से०मी० से अधिक न हो। बीज की बुवाई हमेशा जुड़वा क्यारी (30-60-30 ग 10 से०मी०) मे करे। ऐसा करने से उपज सामान्य बुवाई की तुलना मे 20 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इसके साथ ही थीरम या कार्बेण्डाजिम से बीजोपचार करें और अच्छी उपज के लिए राइजोबियम, पी एस बी और राइजोबक्टेरिया जैसे जीवाणु खाद से बीजों का उपचार करे। ऐसा करने से फली की उत्पादकता 15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। संतुलित पौध पोषण के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे कैल्सियम, जिप्सम के माध्यम से (250 किलोग्राम प्रति हैक्टर) एवं बोरॉन, बोरेक्स के माध्यम से (4 किलोग्राम प्रति है0) प्रयोग करें जिससे मूँगफली की उपज मे बढ़ोत्तरी होती है। जिप्सम की आधी मात्रा बुवाई के समय एवं बोरेक्स की समस्त मात्रा बुवाई के 20 से 25 दिनो के बाद प्रयोग करने से फलियो का उत्पादन बढ़ जाता है। मूँगफली की खेती मे मुख्यता सिंचाई की कम जरूरत होती है, फिर भी जिस खेत मे पर्याप्त नमी न हो ऐसी परिस्थिति मे फसल रक्षक सिंचाई 3 चरणों मे-फूल आते समय, पेगिंग (सूईयां) एवं फलियो के विकास के समय मे दी जानी चाहिये। सभी प्रकार के रोग, कीट एवं पतंगो को नियंत्रण मे रखने के लिए समग्र जीव नाशी प्रबंधन अवश्य अपनाएं। बीजो के भंडारण से पूर्व उन्हे छाया मे सुखाले और फिर पालिथीन स्तर युक्त जूट के बोरो मे रखें। फलियों को कैल्सियम क्लोराइड 250 ग्राम प्रति 30 किलो के दर से उपचार करें इससे बीज की जीवन क्षमता 80 प्रतिशत तक बढ़ जाती है तथा गुणवत्ता को प्रभावित किए बिना अधिक समय तक भंडारण किया जा सकता है।

    गर्मी में भूमि उपचार कर खेत की मिट्टी स्वस्थ बनायें

    "गर्मी में भूमि उपचार कर खेत की मिट्टी स्वस्थ बनाने पर रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने अपनी राय कृषकों को दी है। डॉ वैभव सिंह, और डॉ प्रशांत जाम्भूलकर ने बताया है कि खरीफ मौसम की बुवाई के पूर्व ग्रीष्म ऋतू में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए। गहरी जुताई से मिट्टी की कड़ी परत टूट जाती है जिससे वर्षा के पानी खेत में समां जाता है तथा खेत का जलस्तर बढ़ जाता है। खेत की जुताई खेत की ढाल की दिशा में करनी चाहिए। यह विधि वर्षा आधारित खेती के लिए बहुत उपयुक्त है एवं अनिवार्य रूप से कर मई माह में कर लेनी चाहिए। गहरी जुताई से खेत में पनप रहे हानिकारक कीट जो मिट्टी की गहराई में छुपे रहते हैं वह ऊपरी सतह पर आ जाते हैं और भीषण गर्मी के कारण अथवा चिड़िया द्वारा खा लिए जाते हैं । इसी प्रकार रोगों के बीजाणु जो मिट्टी में दबे रहते हैं, वह बुवाई से पूर्व भीषण गर्मी के संपर्क में आने से नष्ट हो जाते हैं। खरपतवार के प्रबंधन में भी यह क्रिया काफी लाभदायक है जिससे मुख्य फसल में खरपतवार के प्रकोप में भारी कमी देखी जा सकती है। इसके अतिरिक्त खरपतवार के विषैले तत्व जो मिट्टी में दबे रहते हैं जुताई करने से वह नष्ट हो जाते हैं। यह जुताई मई माह में दो बार 15 से 20 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। ज्यादा खरपतवार की स्थिति में यह जुताई तीन बार भी कर सकते हैं। गहरी जुताई के बाद किसान बंधुओं को मृदा उपचार के लिए विभिन्न प्रकार की खली ( नीम, मूंगफली, महुआ, सरसों इत्यादि), गोबर की खाद या एफ वाई एम के उपयोग से जैव संशोधन उपलब्धता अनुसार करना चाहिए। इससे मृदा स्वस्थ, मित्र सूक्ष्मजीव में वृद्धि व हानिकारक सूक्ष्मकृमि का नाश होता है। मृदा जनित रोगों के नियंत्रण हेतु बुवाई पूर्व ट्राईकोडर्मा संवर्धित गोबर खाद का प्रयोग करें। इसके लिए 200 किलो गोबर खाद में 1 किलो ट्राईकोडर्मा पाउडर मिलाएं तथा नमी के लिए पानी छिडकें। इस ढेर को प्लास्टीक की तिरपाल से ढके एवं लगभग 20-25 दिनों पश्चात् ट्राईकोडर्मा संवर्धित खाद उपयोग हेतु तैयार हो जाती है। खेत तैयार करते समय इस मिश्रण के उपयोग से उर्वरा वृद्धि के साथ मृदा जनित रोगों का प्रकोप भी कम होता है।

    टिड्डियों की उत्पत्ति और उनका प्रकोप

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में टिड्डियों की उत्पत्ति और उनका प्रकोप पर डॉ. उषा, डॉ. एम. सोनिया देवी और डॉ. विजय कुमार मिश्रा डॉ.सुन्दर पाल ने सलाह जारी किया है। भारत में, पिछले कुछ हफ्तों में, रेगिस्तानी टिड्डियों के छोटे झुंड, पाकिस्तान से, पूर्व में, राजस्थान की ओर से बुंदेलखण्ड तक पहुँच चुकी हैं। इसकी उत्पत्ति पूर्वी अफ्रीका, पाकिस्तान, ईरान, मिश्र और भारत के राजस्थान एवं गुजरात के रेगिस्तानों में मानी जाती है। रेगिस्तानी टिड्डियां सीमाओं का सम्मान नहीं करती है। यह एक दिन में 150 किमी तक की यात्रा कर सकता है और भोजन में अपना वजन लगभग 2 ग्राम प्रतिदिन खाता है। एक वर्ग किमी को मापने वाले एक झुंड में 8 करोड़ तक टिड्डे हो सकते हैं, जबकि अधिकांश झुंड लगभग 10-500 वर्ग किमी के होते हैं। रेगिस्तानी टिड्डी का जीवनकाल लगभग तीन से पांच महीनों का होता है। किन्तु इनका जीवनकाल बेहद परिवर्तनशील है और मौसम तथा अन्य पारिस्थितिक स्थितियों पर भी निर्भर करती है। इसके जीवन चक्र में तीन चरण शामिल हैं- अंडा, हॉपर (अप्सरा) और वयस्क। इनके अण्डे सेने की समय सीमा तापमान के आधार पर लगभग दो सप्ताह (10-65 दिन) तक होती है। हॉपर लगभग 30-40 दिनों की अवधि में विकसित होते हैं। वयस्क टिड्डे लगभग तीन सप्ताह से नौ महीने तक जीवित रह सकते हैं। शुष्क और आद्रता वाले वातावरण में इनका प्रकोप बढ़ जाता है और ये महामारी का रूप ले लेते हैं। इसलिये आगे भी इनके प्रकोप के प्रति तैयार रहने की जरूरत है। यह जानकारी निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ. एस. एस. सिंह ने दी।

    बुंदेलखण्ड में जैबिक खेती के बढ़ावे के लिये नीम अर्क का करें प्रयोग

    बुंदेलखण्ड में जैबिक खेती को सरकार बढ़ावा दे रही है जिसमें नीम अर्क के उपयोग का विशेष महत्तव हैं। रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झाँसी के वैज्ञानिक डॉ सुन्दर पाल और डाॅ प्रशान्त जाम्बोलकर ने बताया कि नीम के फूल, फल, बीज, पत्तियां, जड़ और छाल में औषधीय गुण होने के साथ-साथ यह फफूंदी नाशक, कीट नाशक और सूक्ष्मकृमि नाशक गुण रखते है। नीम अर्क गैर विषैले होने के कारण अन्य जीवो पर कोई नुकसान नहीं पहुंचाता और स्थलीय एवं जलीय वातावरण को भी दूषित नहीं करता। नीम अर्क का उपयोग सभी प्रकार के रस चूसने वाले कीड़ों एवं सुंडीयों के साथ-साथ यह 100 से भी अधिक कीटों की वृद्धि और विकास पर सीधे प्रभाव डालता है। नीम की पत्तियों का अर्क तैयार करने के लिए इनकी पत्तियों को पेड़ से तोड़कर अच्छी तरह से साफ कर इन्हें छायादार स्थान पर रखकर सुखाते हैं। सूखी हुई पत्तियों को पीसकर पाउडर बना कर एक मिली मीटर व्यास वाली छलनी से छान लें। सूखी पत्तियों के पाउडर की 100 ग्राम मात्रा को 300 मिलीलीटर पानी के साथ-साथ 5 मिलीलीटर अदरक का रस या 5 मिली ग्राम सर्फ पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला दें और इसे रात भर के लिए छोड़ दें। अगले दिन इस मिश्रण को हिलाकर, पतले कपड़े से छान लें और कपड़े में बचे मिश्रण में इतना पानी डाले कि अर्क की मात्रा 2 लीटर हो जाए। मिश्रण की मात्रा को और बढ़ाने के लिए नीम की पत्तियों के पाउडर की मात्रा को इसी अनुपात में बढ़ा लें। इसी प्रकार से हम मिश्रण की मात्रा को बढ़ा सकते हैं। अब यह रसायन फसलो में छिड़कने के लिए तैयार है। नीम की फलियों से अर्क बनाने के लिए इसकी निबोरियों को पानी से भरी बाल्टी में डाल कर तब तक मसलते हैं जब तक कि बीजों से छिलका व गूदा अलग न हो जाए। निकाले गए बीजों को हवादार छाया में एक चादर के ऊपर एक समान रूप से फैला दें और 6 से 7 दिन तक सुखाने के बाद बीजों को छोटे-छोटे हवादार थेलो में भरकर रखें। कुछ समय पश्चात बीजों से कठोर छिलका निकाल कर गिरी को घरेलू मिक्सी में या सिलबट्टी की सहायता से पीसकर पाउडर बना लें और उसे 1 मिली मीटर व्यास वाली छलनी से छान लें। 100 ग्राम गिरी पाउडर को 300 मिलीलीटर पानी के साथ 5 मिलीग्राम सर्फ का पाउडर मिला दे और एक रात के लिए छोड़ दें। सुबह में इसे हिलाकर महीन सूती कपड़े से छान लेते हैं। कपड़े पर बचे हुए मिश्रण में से फिर इतना पानी डालते हैं कि जिससे घोल की मात्रा 2 लीटर हो जाए। इस घोल को एक स्प्रेयर मशीन में डालकर शाम के समय फसलों पर छिड़काव करने से फसलों के कीड़ो से रक्षा की जा सकती है। नीम की पत्तियों एवं फलियों का अर्क को ४ मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करने से फसलों में रस चूसक कीट के नियत्रण कर विषाणु रोग के प्रसार का जैविक प्रबंधन किया जा सकता है।

    सूचना प्रोद्योगिकी अपनाकर किसान आय बढ़ाए

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झाँसी के कुलपति डॉ अरविंद कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन मे बुंदेलखंड क्षेत्र के लिये वर्तमान समय में वैज्ञानिकगण डा. प्रिंस कुमार सोम, डा. डेविड भास्कर ने बताया कि कोविड-19 महामारी के प्रकोप से किसानो को परम्परागत तरीके अर्थात कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र, व ई-चोपाल, से कृषि सम्बंधित जानकारी न मिलने के कारण किसानो के अधिकतर फसल उत्पाद, फसल कटाई का मौसम होने के कारण किसानो को कृषि सम्बन्धी जानकारी का अभाव हुआ है। इसी कारण से किसानो की आय भी प्रभावित हुई है इसके लिए किसान सूचना प्रोद्योगिकी को अपनाकर अपनी आय स्तर बढ़ा सकते है। सूचना प्रोद्योगिकी कोविड-19 के संक्रमण को कम करने के साथ ही कृषि क्षेत्र में उत्पादक व उपभोक्ता का सामंजस्य स्थापित करने में सफल रही है। किसान सूचना प्रोद्योगिकी के माध्यम से किसान किसान कॉल सेंटर न. 18001801551 के द्वारा व किसान मोबइल एप्प द्वारा भी मौसम सम्बन्धी, पोध संरक्षण, कीटनाशक, भंडारण, विपणन, व पशु चिकित्सा से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त कर सकते है। किसान ष्कृषि विज्ञान केन्द्रष् द्वारा सूचना क्रान्ति के माध्यम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे गूगल मीट, जूम एप्प, व्हाट्सप ग्रुप तथा फेसबुक आदि के माध्यम से भी कृषि संबंधित जानकारी प्राप्त कर लाभ उठा सकते हैं। समाचार पत्र भी विभिन्न श्रोतों से कृषि संबंधी जानकारी देते हैं। आधुनिकी सूचना प्रोद्योगिकी ई-नाम पोर्टल के माध्यम से भी किसानो को बाजार की जानकारी के साथ उपज बेचने के लिए बाजारो के बारे में महत्वपर्ण जानकारी प्रदान की जाती है। साथ ही बाजार की वर्तमान कीमत और बाजार में वस्तुओ की माँग की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाती है इससे किसान उचित समय पर व् उचित मूल्य पर फसल उत्पादन को बेचने का निर्णय लेकर अपनी आय का स्तर बढ़ा सकते है। इसके साथ ही एम-किसान पोर्टल पर अपना पंजीकृत कराकर मोबईल पर एस. एम. एस. द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते है।

    गर्मियों में भूमि की नमी बचाकर पौधों को सुरक्षित रखें

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ अरविन्द कुमार के निर्देशन में गर्मियों में भूमि की नमी बचाकर पौधों को सुरक्षित रखने हेतु डाॅ प्रभात तिवारी एवं डाॅ एम. जे. डोबरियाल ने सलाह जारी किया है। वे कहते हैं कि ग्रीष्म ऋतु जब आती है तो अपने साथ कई सारी परेशानियों को भी लेकर आती है, और मुख्यतः बुंदेलखंण्ड क्षेत्र में तापमान में और भी अधिकता हो जाती है। इस अवस्था में वृक्षों को बचाना भी अत्यंत दुर्लभ कार्य होता है, इसलिए हमें वृक्षों का भी निरंतर ख्याल रखना चाहिए। सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि उन्हें तेज धूप से बचाया जाए और इसके लिए वृक्षों के चारों ओर पॉलिथीन या कपड़े का जाल बनाकर तेज गर्मी से उनकी रक्षा कर सकते हैं। गर्मियों में वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया भी बहुत अधिक होती है, जिससे मिट्टी तथा पौधों में उपस्थित जल भाप बनकर उड़ जाता है और पौधे नमी की कमी होने के कारण झुलस जाते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि हम पौधों को निरंतर जल का प्रवाह देते रहें एवं उसके लिए हमें जल एक साथ ना देकर कुछ समय अंतराल पर देना चाहिए और हो सके तो सिंचाई की उन्नत तकनीकों जैसे माइक्रो तथा स्प्रिंकलर सिंचाई का प्रयोग लाना चाहिए। पौधे मुख्यतः जल अपनी जड़ों द्वारा भूमि के अंदर से खींचकर अपने तमाम अंगों में भेजते हैं। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि भूमिगत जल व भूमिसतह में भी नमी बनी रहे और इसके लिए किसानों को फसलों की भूसें, पाॅलीथीन, सूखी हुई खरपतवार, पेड़ों की पत्तियां इत्यादि का भी इस्तेमाल मल्चिंग के रूप में कर सकते हैं। गर्मियों के मौसम इन तरीकों को अपनाकर हम सब वृक्षों की देखभाल सुनिश्चित कर सकते हैं।

    कम लागत में पोषण सुरक्षा और अधिक आय के लिये कोदो का करे उत्पादन

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने कम लागत में पोषण सुरक्षा और अधिक आय के लिये बुंदेलखण्ड में खरीफ के मौसम में कोदो की फसल लगाने की सलाह दी। विवि के कुलपति डाॅ0 अरविन्द कुमार एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ0 एस. एस. सिंह के निर्देशन में वैज्ञानिक डाॅ अमित तोमर एवं डाॅ0 विष्णु कुमार ने बताया कि बुंदेलखंड की प्राचीन फसलों में मोटे अनाज का कभी वहुलता में कृषि हुआ करती थी। लेकिन बदलते समय के साथ सांवा-कोदो जैसी फसलें तो गायब ही हो गई। लेकिन एक बार फिर इन फसलों के दिन आने वाले हैं। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने मिलेट्स बीज हब के अन्र्तगत कोदो का बीज उत्पादन शुरू किया है। बुंदेलखंड का मुख्य व्यवसाय खेती है। प्राचीन समय यहाँ लोग मोटे अनाजों की खेती करते रहे हैं। लेकिन समय के साथ खेती का स्वरूप भी काफी बदल गया। मोटे अनाजों की जगह धान, गेहूं, चना, मटर, मसूर जैसी फसलों ने ले ली है। सरकार का जोर किसानों की आय दोगुना करने पर है। स्थानीय स्तर पर रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने सांवा और कोदो की पैदावार की योजना बनाई है। एक बार फिर मोटे अनाजों के उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। कोदो की बोआई का समय 15 जुलाई तक है। इसे पंक्तियों में बोने से उत्पादन अच्छा होता है। पंक्ति से पंक्ति की दूरी 40 से 50 सेमी, पौध से पौध की दूरी 8 से 10 सेमी व गहराई 3 सेमी होनी चाहिए। एक हेक्टेयर में 10-15 किलो ग्राम बीज की जरूरत होती है। इससे औसत उत्पादन 20 से 22 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक तथा सिंचित कृषि में कुल उत्पादन 25 से 30 कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक होती है। इस फसल में कम पानी में भी अच्छा उत्पादन होता है। कोदो बुंदेलखंड के लिए मुफीद फसल है। क्योंकि यहां सिचाई की समस्या रहती है। जबकि इस फसल में यदि लंबे समय तक बारिश न हो तो एक या दो सिंचाई ही करनी पड़ती है। ।

    फसल उत्पादन बेचने की आधुनिक विधि अपनाकर अधिक लाभ उठायें

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाॅसी के कुलपति ड अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में फसल उत्पादों को बेचने के लिये आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की सलाह दी है। इस सम्बंध में डॉ डेविड और डाॅ. पी. के. सोम ने बताया कि काविड-19 के कारण देश में कृषि उत्पादों की बिक्री पर प्रत्यक्ष रूप से बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है। जिसके कारण किसानों को अपनी फसल उपज की बिक्री व उचित मूल्य जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस प्रक्रिया में ई.नाम (इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केटिंग) किसानों के लिए हितैषी बनकर उभरा है। इसके माध्यम से किसान अपनी उपज को सही समय पर व उचित मूल्य पर बेच सकते हैं। यह माध्यम किसानों को अपनी फसल उपज बेचने के लिए बेहतर विपजन अवसरों को बढ़ावा देता है। इसके साथ ही कृषि उत्पाद विपणन आयोग से संबंधित जानकारी और सेवाओं के लिए एकल खिड़की प्रदान करता है। इस माध्यम से वस्तुओं की पहुंच, गुणवत्ता, उचित कीमतें व ई भुगतान से किसानों के खाते में सीधे धनराशि प्रदान करने से संबंधित खरीदना बेचना शामिल है। कृषि मंत्रालय थोक बाजारों में सामान्य स्थिति बाहल करने के लिये कई ठोस कदम उठाए गए हैं। जिनमें ई.नाम मोबाइल ऐप्प ने किसानों हितेषी सुविधाओं को और मजबूत किया है किसानों के लिए वस्तुओं के विपणन को आसान बनाने व उनकी आवश्यकताओं को पूरी करने के लिए 14 अप्रैल 2016 को ई.नाम को 21 मंडियों में लागू कर दिया था। वर्तमान समय में यह सुविधा ष्एक राष्ट्र-एक बाजारष् (ई.नाम ) को साकार बनाने की दृष्टि से अब 16 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेश के 585 मंडियों तक पहुंच गई है। इसीलिए बुंदेलखण्ड के किसानों को भी अपनी अजीविका को सुचारू रूप से चलाने व प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के लिए ई.नाम प्लेटफॉर्म को अपनाना चाहिए।

    लम्बी अवधि में बड़ी आय का श्रोत है सागौन

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झाॅसी के निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस के निर्देशन में डाॅ पवन कुमार ने सुझाव दिया कि दीर्ध अवधि में अच्छी आय प्राप्त करने के लिये सागौन लगाने की जरूरत है। इसे मेड़ो पर और खेतों में भी लगाया जा सकता है। सागौन से प्राप्त आय बच्चों की उच्च शिक्षा, मकान बनाने और वैवाहिक काम के लिये खर्च किया जा सकता है। इसे किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है। इस पौधे से 15-20 सालों में लकड़ी मिलना शुरू हो जाता है। लकड़ी मजबूत व सुनहरी पीली और उच्च गुणवत्तायुक्त होती है। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के डा. वैज्ञानिक डॉ मनमोहन डोबरियाल ने बताया कि सागौन से खेत में जानवर नहीं घुस पाते और उनकेे फसल की सुरक्षा भी होती है। सागौन की नर्सरी के लिए हल्की ढाल युक्त अच्छी सूखी हुई बलुई मिट्टी होनी चाहिये। मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए खेत की 2-3 बार जुताई करने पशचात मिट्टी को समतल करें ताकि खेत में पानी भर ना हो सके। नए पौधों की रोपाई के लिए 2×2 मीटर की दूरी पर 45×45×45 सैं0मी0 के आयतन का गड्ढे खोदे। प्रत्येक गड्ढे में गली हुई रूड़ी की खाद के साथ कीटनाशक का प्रयोग करें। रोपाई के लिए पूर्व अंकुरन पौधों का ही प्रयोग करें। मॉनसून का मौसम सागौन की रोपाई के लिए सबसे अच्छा मौसम माना जाता है। नर्सरी में बुआई से पहले सागौन के बीजों को 12 घंटे के लिए पानी में भिगो कर अगले 12 घंटे के लिए धूप में सुखाया जाता है। यह प्रक्रिया 10-14 दिनों तक बार बार दोहराई जानी चाहिये। नियमित समय पर गोड़ाई। सागौन बहुत जल्दी बढ़ने वाला पौधा है। समय समय पर पौधों की जांच करते रहना चाहिए और आवश्यक खाद भी देते रहना चाहिए। चार साल में एक पंक्ति के अन्तराल को छोडकर सागौन की लाईन काटकर बेच देना चाहियें इससे पूरी लागत निकल आती है। इसे परिपक्व होने पर 10-25 साल के बीच में बेचने पर भारी मुनाफा (पचास लाख से एक करोड़ रूपये) होता है। अतः दीर्ध अवधि में सागौन अतिरिक्त आय का श्रोत बन सकता है।

    खरीफ सब्जियों की पौध स्वयं तैयार करें

    खरीफ सब्जियों की खेती बुंदेलखण्ड के किसान बहुतायत में करते हैं। बाजार में मिलने बाले पौधों में बीमारियों के साथ महंगी भी होती हैं। वैज्ञानिक तरीके से इन पौधों को स्वयं तैयार एवं बेचकर अतिक्ति आय प्राप्त कर सकते हैं। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झाॅसी के कुलपति डाॅ. अरविन्द कुमार एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस सिंह के निर्देशन में डाॅ. अर्जुन लाल ओला, डाॅ. मनीष पाण्डेय एवं डाॅ. ए. के. पाण्डेय ने सुझाव दिया कि वर्षा ऋतु की हल्की शुरूआत हो चुकी है, और जल्द ही मानसून भी आने वाला है। मृदा में नमीं की मात्रा पर्याप्त है और इसे ध्यान में रखते हुये वर्षाकालीन टमाटर, बैंगन व मिर्च की फसल लेने के लिए नर्सरी में बीजांे की बुआई जून के प्रथम पखवाडे में करंे। बीजों की बुआई करने के लिए सबसे पहले पौधशाला के लिए स्थान का चुनाव करना चाहिए, पौधशाला के लिए चुना हुआ स्थान सामान्य धरातल से कुछ ऊँचा होना चाहिए। भूमि उपजाऊ एवं जल निकास की उचित व्यवस्था के साथ सिंचाई का स्त्रोत भी पौधशाला के पास ही होना चाहिए। पौधशाला की भूमि को निजर्मीकृत करने के लिये 50 ग्राम ट्राइकोडर्मा नामक कवक को प्रति लीटर जल घोल कर उपयोग में लेते है जिससे कवक जनित रोगो का निवारण किया जा सकता है। पौधशाला में दीमक व अन्य भूमिगत कीटो की रोकथाम के लिये क्लोरोपाॅयरिफाॅस या नीम की पत्तियों की खाली भूमि में मिलाते है। पौधशाला की क्यारियों को 1.0 मी. चैड़ी व 3-8 मी. लम्बी बनाते है। प्रत्येक नर्सरी बेड मे 3 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से एवं 50 ग्राम नत्रजन, फास्फोरस व पोटाश का मिश्रण समान मात्रा में डाले। पौधशाला में दो क्यारियों के बीच 30-40 सेमी. चैड़ी नाली छोड़ते है। बीज की बुवाई से पहले बीज को थाइरम या बाविस्टन या कैप्टान कवकनाशी 2 ग्राम/किग्रा. की दर से उपचारित करें। उसके बाद क्यारी के समानांतर 5 से 7 सेमी की दुरी पर लाईन खीचें। उसके बाद बीज उस लाइन में 1-1.5 सेमी. गहराई पर बुआई कर हल्का दबायें, और अंत में घास-फूस से ढक दें। बुआई के तुरन्त बाद र¨जकेन (फव्वारे) से हल्की सिंचाई करें। बीज की क्यारी क¨ प्रति दिन द¨ बार र¨जकेन से हल्की सिंचाई तब तक करे जब तक अंकुरण न ह¨ जाए। बीज के अंकुरण के बाद घास फूस क¨ हटा दें। पौधशाला में बुआई के 25-30 दिन बाद पौधे खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाती है।

    बुआई के पहले किसान सरलता से करें अपने बीज का परीक्षण

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. अरविन्द कुमार एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस के निर्देशन में डाॅ. नीलम बिसेन, डाॅ. विष्णु कुमार, डाॅ. गुँजन गुलेरिया, एवं डाॅ तनुज मिश्रा ने बताया कि किसान बुआई के पहले सरलता से बीज की अंकुरण क्षमता का परीक्षण कर सकते हैं। बरसात के आगमन के साथ किसान खेत की तैयारी में लग जाते हंै, लेकिन उसके साथ ही साथ बीज की अंकुरण क्षमता का सही आकलन भी अच्छे उत्पादन के लिए आवश्यक है। बुन्देलखण्ड के किसान मुख्यतः स्वयं के बीज का उपयोग करते है, और ऐसे में यह अत्यंत जरुरी हो जाता है की वो अपने बीजों की अंकुरण क्षमता का परीक्षण पहले से ही करके रखे ताकि उचित बीज दर पर बुआई की जा सके। बीज के परीक्षण की विधि बहुत ही आसान है जिसे किसान स्वंय अपने घर पर कर सकते हंै। इसके लिए 100 बीजों को एक मोटे सूती कपड़े में या जूट की बोरी में दूर दूर रख कर इसे गीला करके छाँव में नमी बनाकर रखंे और 4-5 दिन बाद में अंकुरित बीजों की गिनती करंे। दूसरी विधि में अखबार की 4-5 पन्ने लेकर इसे 4-5 बार उल्टा सीधा मोड़कर उनके बीच में बीज को रखकर और इनके किनारो को मोडकर दोनों छोरों पर धागे से बाँध दे और पानी में भिगों दें। अतिरिक्त पानी को निकाल कर पेपर को पॉलीथिन में रख कर घर के अंदर खूंटी पर लटका दें। चार से पाॅच दिनों में अंकुरित बीजों की गिनती करना चाहिये। साधारणतया अंकुरित बीजो की संख्या अगर 80-90 के बीच आती है तो बीज उत्तम किस्म का माना जाता है, और 60-70 बीज के अंकुरण पाये जाने पर 30-40 प्रतिशत बीज दर बढ़ाकार बोने की सलाह दी जाती है। इसी प्रकार यदि अंकुरित बीज की संख्या 60 से कम आती है तो बीज बदल देना ही उचित होगा। इस प्रकार किसान बीज की गुणवत्ता का पता करके अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।


    अखबार विधि द्वारा बीजों के अंकुरण क्षमता का परीक्षण

    सफेद मूसली की खेती - लाभकारी सौदा

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. अरविन्द कुमार एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस के निर्देशन में डाॅ विनोद कुमार, डाॅ पंकज लावानिया, डाॅ अमेय काले ने बताया कि म्ूासली मूलतः एक कन्द है जिसकी बढोत्तरी जमीन के अन्दर होती है। सफेद मूसली प्रयः दवाओं के लिये उगायी जाती हैं। प्रति एकड़ कृषक इससे 2.0 लाख रूपये तक लाभ कमा सकते हैं। मूसली की फसल के लिये खेत की तैयारी करने के लिये सर्वप्रथम खेत मे गहरा हल चलाऐं। अच्छी जल निकास वाली रेतीली दोमट मिटटी जिसमंे जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा उपस्थित हो, इसकी खेती के लिये सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। यदि खेत में हरी खाद के लिए अल्पावधि वाली फसल लगायी गयी हो तो उसे काटकर खेत में मिला दें, तदुपरांत एक खेत में 20-25 क्विंटल वर्मीकम्पोस्ट, 5 क्विंटल बोनमील, बायो एंजाइम 16 किलोग्राम, 5 ट्राली सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए । सभी खादों को खेत की अंतिम जुताई से पहले खेत में डाल कर अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए तदुपरांत पाटा चलाकर भूमि को समतल बना लेना चाहिए। मूसली की अच्छी पैदावार के लिए खेत में क्यारियाॅ बना ली जाये, इस सन्दर्भ में सामान्य खेत में 3-3.5 फीट चैड़े ओर कम से कम 6 इंच से 1.5 फीट ऊँचे उठी क्याॅरियाॅ बनाए। क्यारियों के किनारों पर आने-जाने के लिए 50 से0मी0 चैडा रास्ता छोड़ा जाना आवश्यक है। आलू की तरह सिंगल बेड् भी बनाये जा सकते है हालाँकि इसमे ज्यादा जगह लगती है परन्तु मूसली उखाड़ते समय यह सुविधाजनक होते है। पानी की उचित जल निकासी हेतु नालियों की पर्याप्त व्यवस्था की जानी चाहिऐ। मूसली की बीजाई इसकी धन कंदों /टयूवर्स/ फिंगर्स से की जाती है। अच्छी फसल की प्राप्ति के लिये अच्छी गुणवत्ता तथा प्रमाणिक बीज आवश्यक होती है। जिसके लिये 5-10 ग्राम तक वजन के क्रउन युक्त फिंगर्स को 15-20 से0मी0 की दूरी पर लगाऐं। इस प्रकार प्रति एकड़ 4 क्विंटल या प्रति हैक्टैयर 10 क्बिंटल फिंगर्स /पौध सामग्री की जरूरत पडती है। सम्पूर्ण पौधे जिसमें फिंगर्स की संख्या 10-15 होती है उन्हे तेज व्लेड से एक से दो क्रउन युक्त फिंगर्स में विभाजित कर रोपण करे। प्रयुक्त किये जाने वाले फिंगर्स का छिलका क्षतिग्रस्त ना हो यह सावधानी जरूर बरतें। जून से जुलाई माह के प्रारम्भ में तैयार बेड र्समेंल कडी की सहायता से उचित गहराई के गढढे बनाकर कन्दों का रोपण़ 6×6 इंच की दूरी पर करे।

    फूल उत्पादन के लिये इस समय क्या करें

    रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस के निर्देशन में डॉ गौरव शर्मा, डॉ प्रियंका शर्मा एवं डॉ ए के पाण्डे ने बताया कि फूलों की खेती करते हुए किसान भाई सामाजिक दूरी बनाए रखे, मुँह ढक कर रखें एवं कार्य के बीच में साबुन से हाथ साफ करते रहें। गुलाब के फूल जो बिके न हों उन्हें फेंकने के बजाय गुलकंद बनाएँ। गुलाब में पाउडरी मिल्डु नामक बीमारी को बाविस्टीन 0.2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें। गुलाब में थ्रिप्स एवं माइट्स का प्रकोप इस गर्मी एवं सूखे वातावरण में ज्यादा होता है। इसके रोकथाम के लिए थाइओमेथोएक्जाम 3 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी का घोल बना कर छिड़काव करें। गेंदा, गेलार्डिया एवं अन्य बरसाती फूलों के लिए खेत की तयारी शुरू करें। अच्छी गहरी जुताई कर खेत को सोलाराइजेसन के लिए छोड़ दें। सेवन्ती (गुलदाउदी) की खड़ी फसल को काट दें (जमीन से 7 से मी ऊंचाई तक) एवं सिंचाई कर के कोई भी नाइट्रोजन युक्त खाद दें। ग्लाडिओलस के कन्द खोद कर निकालें एवं 2ग्राम प्रति लीटर के कार्बेण्डजीम के घोल में 15 मिनट डाल कर निकाल लेवे एवं छायादार स्थान में एक सप्ताह के लिए सूखने दें। कोई भी फूल या अलंकृत पौधा जो कि खेत या गमले में हो उसकी सिंचाई अवश्य करें साथ में खरपतवार को भी निकालते रहें।

    जून माह में कृषि वानिकी हेतु सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झाॅसी के कुलपति डाॅ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में कृषि वानिकी के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। डा.ॅ पंकज लवानिया, डाॅ. प्रभात तिवारी तथा डाॅ. मनमोहन डोबरियाल ने सलाह दी है कि किसान भाई उद्देशीय वानिकी पौधे जैसे सागौन, शीशम, सहजन, कदम्ब, मिलिया, बबूल, आवला, बेल, खैर, महुआ, इत्यादि को खेतों की मेड व खेत के चारो तरफ, या खेतो में पक्ति फसल के साथ वर्षाकाल में लगाने की तैयारी करे। उपरोक्त पौधों की प्रजातियां वर्षाकाल में लगाने के लिए गडढो की खुदाई अव मई के प्रथम सप्ताह में शुरू कर दे। वृक्ष प्रजातियों के अनुसार गडढो का आकर एवं दूरी सुनिश्चित करें। सागौन और शीशम, नीम, मिलिया, और कदम्ब के लिये 60×60×60 से0मी0 जबकि सहजन, बबूल, और खेर के लिये 45×45×45 से0मी0 आयत के गडढे खोदना चाहिये। सागौन बबूल और खेर के लिये मेड़़ पर 3 मी0 और खेत पर 4 मी0 दूरी पर गडढे खोदना चाहिये। शीशम, नीम, मिलिया और कदम्ब के लिये मेड़़ और खेत दोनो स्थिति में 4 मी0 पर गडढे खोदना चाहिये। सहजन के गडढे मेड़़ पर 1 से 2 मीटर के दूरी पर खोदना चाहिये। यदि इन वृक्षो को खेत में लगाना हो तो सागौन के लिये 5 मी0, शीशम के लिये 4 मी0, अन्य वानिकी पौधो के लिये 6 मी0 पर पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर गडढो को रखना चाहिये। कृषि वानिकी प्रणाली में सामान्यता पौधे की पौधे से दूरी व पंक्ति से पंक्ति की दूरी इस प्रकार रखे कि कृषि उपकरण जैसे ट्रेक्टर आदि का आसानी से प्रयोग हो सके। मई माह में इन गडढो को सूर्य ताप से उपचारित होने के लिये छोड देना चाहिये। उपचारित गढ्ढों में पकी हुई गोबर की खाद मिलाकर जून के अंत में बंद कर देना चाहिये।

    बुंदेलखंड में किसान करे एरोबिक धान की खेती

    रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ0 अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ0 एस एस सिंह के मार्गदर्शन में बुन्देलखंड में एरोबिक धान की खेती करने के बारे में वैज्ञानिकगण डाॅ0 मनोज कुमार सिंह, एवं डाॅ0 विष्णु कुमार ने सामयिक सलाह जारी की है। इसमें इन्होने बताया कि बुन्देलखंड जहाँ सिंचाई की पर्याप्त सुविधा नहीं है, किसान धान की खेती करते हैं और अक्सर सूखा जैसी स्थिति बनी रहती है, ऐसे में एरोबिक धान की खेती से किसान बिना गाना/सांगा लगाए, सीमित सिंचाई एवं सीधी बुआई से धान पैदा कर सकते हैं। भा.कृ.अ.प.-पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना से विकसित की गई धान की दो प्रजातियां स्वर्ण श्रेया व स्वर्ण शक्ति को विश्वविद्यालय के फार्म एवं कुछ चयनित किसानो के खेतों पर परीक्षण हेतु लगाई जाएगी। भूमि में समुचित नमीं से भी इन प्रजातियों की अच्छी पैदावार हो जाती है। सीधी बुआई के लिए इनका बीज दर 25 से 30 किलोग्राम/हेक्टेयर है। सामान्य परिस्थिति में येे प्रजातियां 45 से 50 कु/हे. और सूखा की स्थिति (30 से 45 वर्षा रहित दिन) में भी 25 से 30 क्विंटल/हेक्टेयर की उपज दे सकती हैं। एरोबिक धान 115-120 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। अतः एरोबिक तरीके से धान की खेती करके 40 से 50 प्रतिशत जल की बचत के साथ अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।

    रोग रहित मूगफँली उत्पादन के लिए बीज शोधन करें।

    झाँसी। रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ0 अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ0 एस एस सिंह के मार्गदर्शन में डाॅ. अनीता पूयाम एवं डाॅ. प्रशांत जाम्भुलकर ने बुन्देलखंड में मूंगफली निरोगी मूगफँली उत्पादन से सम्बिंधित प्रमुख रूप से जानकारी दी है। मूंगफली बुन्देलखण्ड की एक प्रमुख फसल है। इनमें चार तरह रोग प्रमुख है ग्रीवा विगलनए सुखा गलनए पर्ण धब्ब और रतुआ। इन रोगों के प्रकोप से 25 से 90 प्रतिशत उत्पादन में नुकसान हो सकता हैं। खेती के लिये रोग मुक्त बीज किसी विश्ववसनीय स्त्रोत से ही प्राप्त करें। बुवाई से पूर्व कवक नाशको से बीजोपचार करें, इसके लिए तीन ग्राम थिरम या कॅप्टन या 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम बीज से बीजोपचारित कर ही बोना चाहिए । कवक नाशको के अलावा जैव नियंत्रण भी रोग की रोकथाम के लिए उपयोगी हैं । जैव कारक जैसे की ट्राइकोडर्मा पाउडर से बीजोपचार करने के लिए चार ग्राम प्रति किलोग्राम बीज में मिला कर ही बोएँ । इससे न केवल रोग की रोकथाम होगी बल्कि ये पोधो के रोग प्रतिरोधन में वृद्धि के साथ पौधे के विकास मे भी सहयोगी होते है । मृदा जनित रोग प्रबंधन हेतू मृदा उपचार आवश्यक है । मृदा उपचार हेतु भी ट्राइकोडर्मा पाउडर का 2.5 किलोग्राम सूत्रीकरण को 100 किलोग्राम गोबर की खाद में मिला कर छाया वाली जगह में 30 दिनों के लिए रख दें । तीस दिनों पश्चात गोबर की खाद पर सफ़ेद रंग की कवक का जाल बन जायेगा जो की प्रयोग के लिए तैयार मानी जाती है। इस बात का ध्यान रखे कि जिस खेत में मूंगफली लगती हो उस खेत में गेहूँ और चने को नहीं लगाना चाहिए ।

    खेत की मेढ़ पर बाँस लगाकर लाभ उठाए

    झाँसी। रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ0 अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डाॅ0 एस एस सिंह के मार्गदर्शन में डॉ गरिमा गुप्ता एवं डॉ मनमोहन जे डोबरियाल ने बाँस के आर्थिक लाभ की ओर ध्यान दिलाया है। बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए इसे पेड़ की श्रेणी से हटा दिया है जिससे इसकी कटाई में कोई कानूनी वाधा नहीं है। और आसानी से काटा एवं बेचा जा सकता है। किसान अपनी आय दो गुनी कर सकते है। बाँस को कलम और प्रकंद के द्वारा लगाया जाता है। बुंदेलखंड में बाँस की बहुत सारी प्रजातियां आसानी से लगाई जा सकती हैं जैसे बम्बूसा टुल्डा, बम्बूसा वुल्गैरिस, और डेंड्रोकालमुस स्टिक्टुस। बाँस को 1 मीटर चैड़ी मेड पर 2 मीटर और 3 मीटर की दूरी पर लगाया जा सकता है। बाँस को लगाने के लिए पहले हमें निर्धारित दूरी पर 30ग30 सेंटीमीटर के गड्ढे खोदने चाहिए। हर गड्ढे में 1.5 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 ग्राम यूरिया, 100 ग्राम सुपरफास्फेट, 50 ग्राम पोटाश मिट्टी के साथ मिला कर डाला जाना चाहिए। सामान्यता बांस को बहुत कम मात्रा में रासायनिक उर्वरक डालने की आवश्यकता होती है। पौधे को गड्ढे में लंबवत रखें, और साथ ही साथ यह सुनिश्चित करते हुए कि जड़ें मुड़नी नहीं चाहिए। रोपण के बाद, वर्तमान जलवायु परिस्थितियों के आधार पर, पानी से सिंचाई करें, यह प्रकंद और जड़ों को आवश्यक नमी प्रदान करेगा, और पौधे के चारों ओर ढीली मिट्टी को संपीड़ित करेगा । यदि लगातार पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो अगले 10 हफ्तों के लिए सिंचाई जारी रखें. बांस की वृद्धि को बढ़ाने के लिए मल्चिंग एक बहुत अच्छा तरीका है उसमें मिट्टी और पत्तियों को मिलाकर बाँस के आधार पर फैला दिया जाता है। गर्मियों में हरे चारे की कमी के समय बाँस को चारे के रूप में भी जानवरों को खिलाया जा सकता है। बाँस को डेयरी, मांस और पोल्ट्री संचालन के दौरान जानवरों के कचरे, नाइट्रेट एकाग्रता और घोल के भंडारण से जुड़ी समस्याओं को सुधारने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। खेतों की मेड़ पर बाँस की जैविक बाड़, आवारा पशुओं के खिलाफ सुरक्षा के रूप में कार्य करती है और साथ ही किसान अपनी नियमित फसल की खेती के साथ 1 से 1.5 लाख सालाना अतरिक्तआय प्राप्त कर सकते हैं । बाँस को लगाने के चार साल के बाद से हर साल, लगभग 30 से 35 साल तक उत्पादन लिया जा सकता है । इच्छुक किसान कृषि विश्वविद्यालय के वानिकी विभाग से संपर्क कर सकते है।