रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय में आपका स्वागत है

    कोविड-19 परिस्थिति में पशुपालको के लिये सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में पशुपालको के लिये सलाह जारी किया है। इस समय पूरे बुन्देलखण्ड में लॉकडाउन घोषित है। ऐसे कठिन समय में खेती बाड़ी सहित पशुधन की सुरक्षा अति आवश्यक है। यह समय रबी फसलों जैसे दलहन, तिलहन, गेहूॅ एवं अन्य फसलों की कटाई समाप्ति की ओर है। इस समय में तापमान बढना शुरू हो रहा है। पशुओं में पानी व नमक की कमी, भूख कम होना एवं कम दूध उत्पादन जैसी समस्याऐं आना शुरू हो जाती है अतः पशुओं को अत्यधिक तापक्रम से बचाने के उपाय करें। मालवाहक पशुओं को दोपहर से शाम 5 बजे तक छाया वाले एवं हवादार स्थान में आराम करने दें। पशुओं को दिन में कम से कम 4 से 5 बार पानी पिलाने का प्रयास करें। कुछ मादा पशुओं में गर्मी के लक्षण रात्रि में अधिक तथा दिन में कम दिखाई देते है। इसका पशुपालक नियमित ध्यान दें। थनैला रोग की पहचान एवं रोकथाम के उपाय करे। मैमनो को फडकियॉ व भेड़ चैचक रोग का टीका लगवाऐ। गाभिन पशुओं को प्रोटीन युक्त अतिरिक्त पशु आहार दे।

    इस समय चरागाह में हरे चारे का अभाव है तथा पोषण अपर्याप्त होता है ऐसे में पशुओं में पाईका रोग के लक्षण प्रकट होते है। इससे रक्षा हेतु मिनिरल ब्लॉक में लवण मिश्रण अवश्य मिलाऐ।

    सामूहिक प्रयासो से किसान सुनिश्चित करे कि मृत पशु, हड्डी चमड़ा, कंकाल आदि चारागाह के रास्तों एवं उन स्थानों पर इक्ट्ठा नही होने पाऐ जहा से पशुओं का रोजाना आना- जाना रहता है। एसे स्थानो की तार बन्दी कर पशुओं को रोके क्योकि मृत पशुओं के अवशेषों को खाने व चबाने से प्राणघातक बाटुलिनता रोग हो सकता है। जिसका कोई उपचार नही है। चारे के लिये बोई गई मक्का, बाजरा एवं ज्वार की कटाई 45 से 50 दिन की अवस्था में करें। पशुधन की देखभाल करते हुये मॉस्क का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे

    बुन्देलखण्ड में गरमी में खेतो की तैयारी एवं भूमि सुधार की सलाह

    बुन्देलखण्ड में रबी फसल कटाई समाप्ति कि ओर है ऐसे में भूमि सुधार एवं वर्षा जल संरक्षणं का कुछ काम अभी सामयिक एवं आवश्यक है इसमें असमतल बड़े खेतों का सुधार वर्षा जल संरक्षणं खेतों कि गहरी जुताई ऊसर भूमि सुधार एवं मिट्टी की जांच सम्मलित है । रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के दिशानिर्देशन में सामयिक सलाह जारी की गई है। किसान भाई भूमि विकास कार्य हेतु भू क्षेत्र की बनावट (टोपोग्राफी) को देखते हुए कि किस स्थान पर नलकूप व किस स्थान पर सिंचाई जल निकास नाली व सड़क बनाना उचित होगा, ऐसे स्थान को नियोजित योजना के अनुसार सर्वप्रथम मेड़ बन्दी करके खेत को समतल कर लें। यदि ढाल अधिक हो तो खेत का आकार छोटा अन्यथा 0.4 से 0.5 हेक्टेयर आकार के खेत बनाये जाए। मेड़ मजबूत बनायी जाए ताकि यह वर्षाकाल में जल बहाव के कारण बह न जाए। मेंड़ 165×45×30 से०मी० या 120×45×30 सेमी० जिसका क्रास सेक्शन 0.44 या 0.34 मीटर हो, उपयुक्त होगी।वर्षा जल संरक्षण हेतु किसान भाई मेड़बन्दी एवं खेत के चारों तरफ नाली बनाकर वर्षा जल को सिंचाई हेतु संग्रहीत करें एवं भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि करें ऊसर क्षेत्र का चयन, सर्वेक्षण एवं मृदा सुधारक रसायन का प्रयोग गर्मी में भूमि सुधार का यह काम जरूर करना चाहिये मेड़बन्दी का कार्य पूरा हो जाने के पश्चात् खेत को 15-20 से०मी० गहरा जोतकर लेवलर की सहायता से समतल कर लेना चाहिए और लेविल खेत में पानी भरके एकत्रित कर लेना चाहिए। नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि को 15-20 से०मी० की गहरी जुताई आवश्यक है जिससे नमक रिसाव क्रिया (लीचिंग) में सुविधा हो। ऊसर सुधार में जल निकास का बहुत अधिक महत्व है, जिससे खेत के हानिकारक घुलनशील लवणों को बाहर निकाला जां सकता है। जल निकास नाली का निर्माण चकरोड के दोनों ओर खेत की सतह से 60-90 से०मी० गहरी और 1.2 मीटर चौड़ी होनी चाहिए। इन जल निकास नालियों का नियोजन इस प्रकार किया जाए जिससे खेत का लवणयुक्त पानी किसी नदी नाले में बहा दिया जाए।ऊसर सुधार हेतु जिप्सम और रसायन का प्रयोग बहुतायत से किया जाता है। ऊसर योजना वाले जनपदों में मृदा सुधारक (जिप्सम/पाइराइट) का प्रयोग मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर करना चाहिए। इसके प्रयोग के पूर्व खेत में 5-6 मीटर चौड़ी क्यारियां लम्बाई में बना लेना चाहिए। मृदा परीक्षण परिणाम की संस्तुति के अनुसार मृदा सुधारक (पायराइट/जिप्सम) का प्रयोग किया जाये। जिप्सम का प्रयोगरू इसे फैलाने के बाद तुरन्त कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-10 से०मी० की सतह में मिलाकर और खेत को समतल करके पानी भर करके रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। पहले खेत में 12-15 से०मी० पानी भरकर छोड़ देना चाहिए। 7-8 दिनों बाद जो पानी बचे उसे जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर पुनः 12-15 से०मी० पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। मिट्टी की जांचरू फसल की कटाई हो जाने के उपरांत मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी हेतु मिट्टी की जांच हेतु मिट्टी नमूना एकत्रित कर नमूना प्रयोगशाला को प्रेषित करें तथा मृदा परीक्षण करवाएँ । किसान भाई गर्मी में खेतों कि गहरी जुताई (लगभग 9 से 12 इंच गहरी) करें। गर्मी में खेत मुख्यतः खाली पड़े रहते हैं। इसलिए अगली फसल की बुवाई की तैयारी एवं भूमि सुधार के लिए गर्मीं में गहरी जुताई का सर्वाधिक महत्व है। पूरे खेतों की एक समान जुताई करनी चाहिए तथा बिना जुताई वाला स्थान नहीं रहना चाहिए। जिन खेतों में कठोर तह (हार्ड पैन) बन गया हो उन खेतों में चिजलर का प्रयोग कर गहरी जुताई करें। गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें। इस गहरी जुताई से जल संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण कीट और रोग नियंत्रण में लाभ मिलता है। सारे कामों को करते हुये वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे।

    अप्रैल-मई माह में सब्जियों के खेती-बाड़ी की सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में सब्जी उत्पादको के लिये सलाह जारी की है। इस समय पूरे बुन्देलखण्ड में लॉकडाउन घोषित है। कद्दू वर्गीय फसलों में 4-5 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें, आवश्यकतानुसार यूरिया की टॉप ड्रेसिंग कर दें। ध्यान रखें कि यूरिया पत्तियों पर न गिरे अन्यथा फसल जल जायेगी।लाल भृंग कीट की रोकथाम के लिए सुबह ओस पड़ने के समय राख का बुरकाव करने से कीट पौधों पर नही बैठते हैं या इस कीट का अधिक प्रकोप होने पर मैलाथियान चूर्ण 5 प्रतिशत या कार्बारिल 5 प्रतिशत के 25 किग्रा चूर्ण को राख में मिलाकर सुबह पौधों पर बुरकना चाहिये। भिण्ड़ी की फसल में नाइट्रोजन की प्रति हेक्टेयर 35-40 किग्रा मात्रा (76-87 किग्रा यूरिया) की पहली टाप ड्रेसिंग बोआई के 30 दिन बाद व शेष एक तिहाई 35-40 किग्रा नाइट्रोजन (76-87 किग्रा यूरिया) की दूसरी टाप ड्रेसिंग बोआई के 45-50 दिन बाद करें। भिण्ड़ी व लोबिया की फसल को पत्ती खाने वाले कीट से बचायें।भिण्ड़ी की फसल में फलो की तुड़ाई प्रत्येक तीसरे दिन करें अन्यथा तुड़ाई नियमित न करने पर फल बड़े हो जाते हैं तथा संख्या में कम प्राप्त होते है और उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। लहसुन व प्याज की खुदाई करें। खुदाई के 10-12 दिन पूर्व सिंचाई बन्द कर दें।पूर्व मे ंरोपी गई मिर्च में रोपाई के 25 दिन बाद प्रतिहेक्टेयर 35-40 किग्रा नाइट्रोजन (76-87किग्रा यूरिया) की प्रथम टॉप ड्रेसिंग व इतनी ही मात्रा की दूसरी टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 45 दिनों बाद करें।ग्रीष्मकालीन बैगन में रोपाई के 30 दिन बाद प्रति हेक्टेयर 50 किग्रा नाइटोजन (108किग्रा यूरिया) की पहली टॉप ड्रेसिंग व इतनी हीमात्रा की दूसरी टॉप ड्रेसिंग रोपाई के 45 दिन बाद करें। वर्षा कालीन बैगन की नर्सरी यदि तैयार हो तो उसकी रोपाई 75-90×60 सेंमी की दूरी पर, जहाँ तक सम्भव हो, रोपाई शाम के समय करें तथा रोपाई के तुरन्त बाद हल्की सिंचाई कर दें। वर्षा कालीन बैगन की फसल के लिए नर्सरी में बीज की बोआई इस माह भी कर सकते हैं। नर्सरी तैयार करने के लिए लोटनल पॉली हाउस (एग्रोनेट युक्त) का प्रयोग करने से अच्छी गुणवत्ता की पौध तैयार होगी।टमाटर की फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें। फलों में छेद करने वाले कीट से बचाने के लिए फल तोड़ने के बाद मैलाथियान 0.1 प्रतिशत का छिड़काव करें। छिड़काव के 3-4 दिन बाद तक फलो की तुडाई न करें। बैंगन मैदानी क्षेत्रों में फरवरी-मार्च में लगाई नर्सरी को अप्रेल में रोपाइ की जा सकती है। पूसा भैरव व पूसा पर्पललॉग किस्में उपयुक्त हैं।पहाडी क्षेत्रों में पूसा पर्पल कलस्टर किस्म अप्रैल में रोपने से बढिया उपज देती है। बैगन में तना छेदक कीट से बचाव के लिए नीमगिरी 4 प्रतिशत का छिड़काव 10 दिन के अन्तराल पर करने से अच्छा परिणाम मिलता हैं। या मार्सल (कार्बोसल्फान 20 ई.सी.) 2 मिली लीटर प्रति लीटर पानी में धोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। सूरन की बोआई पूरे माह तथा अदरक व हल्दी की बोआई अप्रैल माह के दूसरे पखवाड़े से शुरू की जा सकती हैं।

    प्रति हेक्टेयर अदरक की बोआई के लिए लगभग 18 कुन्टल, हल्दी के लिए 15-20 कुन्टल व सूरन के लिए 75 कुन्टल बीज की आवश्यकता होती हैं। बोआई से पूर्व हल्दी व अदरक के बीज को 0.3 प्रतिशत का पर आँक्सीक्लोराइड के धोल में उपचारित कर लें।

    बोआई से पूर्व सूरन के बीज को 0.2 प्रतिशत बावेस्टीन या गोबर के धोल में डुबा दें। पुन उसे छाव में सुखाकर बोआई करनी चाहिए।हल्दी, अदरक व सूरन की बोआई के बाद खेत में सूखी पुवाल, धास-फूस या पत्ती से ढ़क दें। इससे खेत में खरपतवार का जमाव नही होता है, नमी संरक्षित रहने से फसल का जमाव भी अच्छा होता है तथा साथ ही इनके सड़ने से खेत में जीवांश पदार्थ की मात्रा भी बढ़ती हैं।चौलाई एक हरी पत्तेदार सब्जी है। पूसा कीर्ती व पूसा किरण किस्मों की बुआई अप्रेल के दूसरे पखवाडे. में कर सकते है। एक हैक्टर में बुवाई के लिए 1000 ग्राम बीज पर्याप्त रहता है। मूली की पूसा चेतकी किस्म की बुवाई अप्रेल में कर सकते है। बीजां की बुवाई के लिए कतार से कतार की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखते हुए 1-1.5 सेमी गहराइ पर लगाएं। बुवाई से पूर्व 10 टन कम्पोस्ट, 80 -100 किग्रा नत्रजन, 50 किग्रा फास्फोरस तथा 80-100 किग्रा पोटाश प्रति हैंक्टर की दर से डालें। फसल में जल्दी-जल्दी हल्की सिंचाईयां करें। ग्वार फलियों के लिए पूसा सदाबहार, पूसा मौसमी व पूसा नववहार किस्में अप्रैल में लगा सकते है। 8-10 कि.ग्रा. बीज को 45 सेमी दूरी पर लाईनों में लगाएं तथा बुवाई से पूर्व 10 टन कम्पोस्ट, 50 किग्रा नत्रजन, 60 किग्रा फास्फोरस तथा 60 किग्रा पोटाश प्रति हैंक्टर की दर से डालें। फलियाँ सब्जी के लिए जून में तैयार मिलती है। वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे। (परामर्शी वैज्ञानिकः- डॉ ए0 के0 पाण्डेय, डॉ अर्जुन लाल औला)

    महुआ फूलो के संकलन पर सलाह

    झॉसी। रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने कोविड-19 परिस्थिति में कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में महुआ उत्पादको के लिये सलाह जारी की है। महुआ बुन्देलखण्ड की एक प्रमुख फल वृक्ष है। अप्रैल में इसके फूलो का संकलन किया जाता है। फूलो को इक्ठ्ठा करते समय कुछ सावधानियॉ किसानों को बरतने की जरूरत है। महुआ के फूल, पेड़ पर चढ़कर वृक्ष की टहनियों को हिलाकर जमीन पर गिरा कर एकत्रित किये जा सकते है। समान्यतः आदिवासी, वृक्ष पर चढ़ने में निपुण होते है जो पेड़ पर चढ़कर फूलों के एकत्रित करते है। लेकिन जमीन पर खड़े रहकर, एक लम्बे डंडे या बांस का उपयोग कर फूलों को जमीन पर गिराना उचित रहेगा। भालू, हिरन, सांबर को महुआ का फूल बहुत प्रिय होते है जिससे वह अपने पौष्टिक आहार की पूर्ति करते है।जंगली हिरन, सांबर पर शेर, तेंदुआ घात लगाए रहते है। इन जंगली जानवरों से अपना बचाव करे।पेड़ से नीचे गिरे फूलों को उठाने के लिए ज्यादा देर झुक कर काम ना करे। इससे शेर तथा तेंदुए को यह आभास होता है की आप हिरन है, और आप पर हमला कर सकते है। सामान्यतः जंगलों में मनुष्य इस के फूलों का संकलन समूह में करते है, जिससे एक - दूसरे को जंगली खतरों से सावधान किया जा सके। महुआ के फूलों के अंदर बहुत गाढ़ा- चिपचिपा रस भरपूर होने कारण, पेड़ पर मधुमख्खियाँ होती है। फूल इकठ्ठा करने से पहले यहाँ सुनिश्चित करले ही पेड ़पर मधुमख्खियों का छत्ता नहीं है। अगर है तो किसी प्रकार मख्खियों को भगाकर अपना बचाव करें। महुआ के फल बहुत नाजुक होने कारण, बड़ी सावधानी से उन्है एकत्रित करें। सामान्यतः फूलों को एकत्रित करने से पहले, पेड़ की निचली जमीन सांफ करने हेतु आग लगाई जाती है। इससे जंगलों में आग फैलने का खतरा होता है। इस विधि को अपनाने के बजाय जमीन पर चादर, दरी, फर्श या प्लास्टिक की चादर बिछाकर, लम्बे डंडे का प्रयोग कर फूलों को गिराया जा सकता है। एकत्रित किये गए फूल बोरी में भरकर एक स्थान पर लाए जाए और धूप में सूखा दे। सुखाये जाने पश्चात, यह सुनिश्चित किया जाये की फूल धूल , मिटटी एवं कंकड़ से मुक्त हो, और छोटी थैलियों में भरकर उन्हें व्यापार हेतु भेजा जा सके। सूखा हुआ फूल बाजार में ९० - ११० रुपये प्रति किलो बेचे जा सकते है। वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे।

    पोषक सुरक्षा और कोरोना वायरस के प्रति अवरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु मोटे अनाजों पर बल दे

    वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व कोरोना वायरस की महामारी से जूझ रहा है। समृद्ध देशों के हजारों लोग अपनी जान गवां चुके हैं और अभी इसके समाधान का कोई कारगर उपाय नहीं निकल पाया है। कोरोना वायरस के वचाव हेतु कई उपायों की सिफारिश की जा रही है जैसे कि अपने घर में ही बन्द रहना, सामाजिक दूरी बनाए रखना, अपने आप को और आस-पास के वातावरण को स्वच्छ रखना, खान-पान में कुछ खास पदार्थों को शामिल करना, इत्यादि। ऐसा लगता है कि कोरोना वायरस की समस्या जल्द खत्म होने वाली नहीं है और अभी काफी समय तक हमें इस के साथ जीना होगा।

    मानव शरीर में बीमारियों के प्रति अवरोधक क्षमता विकसित करने में खान-पान का काफी महत्व है। कुछ लोग अति संवेदनशील होते हैं और जल्द ही बीमारी के प्रकोप में आ जाते हैं। लेकिन कुछ लोगों में बीमारियों के जनक विभिन्न जीवाणुओं विषाणुओं एवं अन्य कीटाणुओं के प्रति अवरोधक क्षमता होती है और वह उनको काफी हद तक सहन कर जाते हैं और इनसे बच जाते हैं। कोरोना के सम्बंध में भी यह सत्य है। हल्दी, लहसुन, जीरा, फल-सब्जी आदि की सिफारिश की जा रही है। जिससे की शरीर में अवरोधक क्षमता विकसित हो सके। इस सन्दर्भ में मोटे अनाजों जैसे ज्वार, बाजरा, कोदो, कुटकी, सांवा आदि फसलों की महत्तवपूर्ण भूमिका है, जिनके सेवन से कोरोना के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। मोटे अनाज वाली फसलों में धान-गेहूं की तुलना में मिनरल, प्रोटीन, विटामिन आदि पोषक तत्त्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं और पाचक दृष्टि से भी स्वास्थ्य के लिये बड़ी हितकारी मानी जाती है। इन फसलों में पाये जाने वाले रेशे पाचन तंत्र के लिये उपयोगी प्रोबायोटिक की वृद्धि में महत्तवपूर्ण योगदान देते हैं। इसलिये ज्यादा शारीरिक कार्य करने वाले एवं कठिन परिस्थितियों में भी रहने वाले लोग इनका सेवन कर अच्छे से गुज़ारा कर लेते हैं।

    हमारे देश में और खासकर बुंदेलखण्ड क्षेत्र में मोटे अनाज की फसलों की खेती किसी ज़माने में बड़े व्यापक तौर पर की जाती थी लेकिन धीरे-धीरे इन फसलों का क्षेत्रफल कम होता गया क्योंकि इन फसलों की अधिक पैदावार देने वाली प्रजातियों का विकास और मंडी में उचित समर्थन मूल्य नहीं मिल पाया। पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है और इन पोषक अनाजों की गुणवत्ता युक्त प्रजातियों का विकास हुआ है एवं उनके समर्थन मूल्य में भी उत्साहवर्धक वृद्धि की गयी है ताकि किसान भाई दोवारा इन फसलों की खेती की तरफ आकर्षित हों और अपनी पोषक सुरक्षा एवं बीमारियों के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ायें। यह भी सच है कि बीमारियों के पनपने में व्यक्ति के जीनोम में पाये जाने वाले विभिन्न जीनों, पोषकता एवं पर्यावरण, और परस्पर संबंधों का योगदान रहा है।

    कृषि विशेषज्ञों द्वारा सिफारिश की गई है कि वर्तमान समय में जबकि हमारे पास खाद्यानों का पर्याप्त भण्डार मौजूद है, ज्वार, बाजरा एवं अन्य मोटे अनाजों की तरफ भी ध्यान देना जरूरी है ताकि खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषक सुरक्षा एवं कोरोना अवरोधक क्षमता को भी सुधारा जा सके। डा. एम. एस. स्वामीनाथन के अनुसार श्खाद्य सुरक्षा ही काफी नहीं है देश को तेज गति से पोषक सुरक्षा की तरफ ले जाना है। इसके लिये दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों को बढ़ावा देना होगा।ष्ष् एक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मशहूर वैज्ञानिक डा. राजीव वार्ष्णेय का मानना है श् भारत इन फसलो की पैदावार में दुनिया में श्रेष्ठ है और अपने लोगो को स्वस्थ रखना एवं कोरोना के प्रति अवरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिये पोषक दृष्टि से महत्तवपूर्ण मोटे अनाजो को प्रोत्साहन देना अत्यंत जरूरी है।ष्ष्

    झॅासी में स्थापित रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय में कार्यरत निदेशक शिक्षा डा.अनिल कुमार ने मण्डुआ (रागी) पर शोध कार्य करते हुये इसे न्यूट्री डेन्स अद्भुत अनाज की संज्ञा देते हुये बताया कि इस छोटे दाने वाली मिलेट फसल में शरीर के लिये अति आवश्यक अमीनो एसिड से युक्त गुणक्ता प्रोटीन के अलावा देर से पचने वाले कार्बोहाइड्रेट एवं हड्डियों को मजबूती प्रदान करने वाले अवयव पाये जाते हैं। इन्हीं गुणों के कारण रागी एवं अन्य मिलेट परिवार वाली फसलों से डायविटीज, ह्नदयरोग, आस्टीयोफेरोसिस, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने एवं पाचन तंत्र आदि के लिये मूल्य संबर्धित उत्पादों की श्रृंख्ला बनाने हेतू विश्वविद्यालय आने वाले समय में कार्य करने जा रहा है। विश्वविद्यालय के निदेशक शोध डा. ए. आर. शर्मा ने बताया कि दलहनी, तिलहनी फसलों के अलावा मोटे अनाज की फसलों को बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बढ़ावा देने हेतु पहल की गई है। ज्वार, बाजरा, कोदो, सांवा आदि फसलों की उन्नत प्रजातियों का शुद्ध बीज तैयार किया गया है जो आने वाले खरीफ मौसम में किसानों के लिये उपलब्ध होगा। यह फसलें कम उपजाऊ शक्ति वाली जमीन में भी अच्छे से उगाई जा सकती हैं। ज्यादा खाद पानी की जरूरत भी नहीं होती है और जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भी बड़ी सहनशील मानी जाती हैं। जो किसान भाई इन फसलों का उत्पादन करना चाहते हैं वह विश्वविद्यालय से सम्पर्क कर सकते हैं।

    विश्व पृथ्वी दिवस पर बुन्देलखण्ड के किसानो को भूमि सुधार की सलाह

    बुन्देलखण्ड में रबी फसल कटाई समाप्ति कि ओर है ऐसे में भूमि सुधार एवं वर्षा जल संरक्षणं का कुछ काम अभी सामयिक एवं आवश्यक है इसमें

  • खेतों कि गहरी जुताईः किसान भाई गर्मी में खेतों कि गहरी जुताई (लगभग 9 से 12 इंच गहरी) करें। पूरे खेतों की एक समान जुताई करनी चाहिए तथा बिना जुताई वाला स्थान नहीं रहना चाहिए। जिन खेतों में कठोर तह (हार्ड पैन) बन गया हो उन खेतों में चिजलर का प्रयोग कर गहरी जुताई करें। गहरी जुताई तीन वर्ष में एक बार अवश्य करें। इस गहरी जुताई से जल संरक्षण, खरपतवार नियंत्रण कीट और रोग नियंत्रण में लाभ मिलता है।

  • वर्षा जल संरक्षणं हेतु असमतल बड़े खेतों का सुधारः भू क्षेत्र की बनावट (टोपोग्राफी) को देखते हुए कि किस स्थान पर नलकूप व सड़क बनाना उचित होगा, ऐसे स्थान को नियोजित योजना के अनुसार सर्वप्रथम मेड़ बन्दी करके खेत को समतल कर लें। यदि ढाल अधिक हो तो 0.4 से 0.5 हेक्टेयर आकार के खेत बनाये जाए। मेड़ मजबूत बनायी जाए ताकि यह वर्षाकाल में जल बहाव के कारण बह न जाए। वर्षा जल संरक्षण हेतु किसान भाई मेड़बन्दी एवं खेत के चारों तरफ नाली बनाकर वर्षा जल को सिंचाई हेतु संग्रहीत करें एवं भूगर्भ जल स्तर में वृद्धि करें।

  • ऊसर भूमि सुधारः ऊसर खेत को गहरा जोतकर लेवलर की सहायता से समतल कर लेना चाहिए और लेविल खेत में पानी भरके एकत्रित कर लेना चाहिए। नई तोड़ी गई ऊसरीली भूमि को 15-20 से०मी० की गहरी जुताई आवश्यक है जिससे नमक रिसाव क्रिया (लीचिंग) में सुविधा हो। जल निकास नाली का निर्माण चकरोड के दोनों ओर खेत की सतह से 60-90 से०मी० गहरी और 1.2 मीटर चौड़ी होनी चाहिए। मृदा सुधारक (जिप्सम/पाइराइट) का प्रयोग मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर करना चाहिए। इसके प्रयोग के पूर्व खेत में 5-6 मीटर चौड़ी क्यारियां लम्बाई में बना लेना चाहिए। जिप्सम का प्रयोग इसे फैलाने के बाद तुरन्त कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-10 से०मी० की सतह में मिलाकर और खेत को समतल करके पानी भर करके रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए। पहले खेत में 12-15 से०मी० पानी भरकर छोड़ देना चाहिए। 7-8 दिनों बाद जो पानी बचे उसे जल निकास नाली द्वारा बाहर निकालकर पुनः 12-15 से०मी० पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करना चाहिए।

  • मिट्टी की जांचः फसल की कटाई हो जाने के उपरांत मिट्टी में उत्पन्न विकारों की जानकारी हेतु मिट्टी की जांच हेतु मिट्टी नमूना एकत्रित कर नमूना प्रयोगशाला को प्रेषित करें तथा मृदा परीक्षण करवाएँ ।

  • सारे कामों को करते हुये वर्तमान कोविड-19 वायरस के प्रकोप को देखते हुये मॉस्क/गमछा का प्रयोग, हाथों की साबुन से नियमित अन्तराल पर धुलाई और सामाजिक दूरी का पालन अवश्य करे। (परामर्शी वैज्ञानिकः- डॉ योगेश्वर सिंह, डॉ सुशील कुमार सिंह, डॉ सौरभ सिंह)

  • अप्रैल-मई माह में पौध सरक्षण सलाह

    वर्तमान में मूंग, कद्दू वर्गीय फसलें और भिन्डी खेत में लगी हैं। इसमें कीडे और बीमारी लग रहे हैं जिनसे फसल की बचाव करना है। अतः किसानों को सामयिक सलाह दी जा रही है।

    मूंग का पीला मोजेक विषाणु रोग
    नियंत्रणः रोग की शुरुवाती अवस्था में रोगग्रस्त पौधे उखाड़कर नष्ट करे। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रीड १७.८ एस एल ०.५ मिली या ऐसीटामिप्रीड २० एस पी. ०.५ ग्राम या डायमिथोएट २ मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करे। प्रति एकड़ खेत में १० पीला चिपचिपा पाश लगायें।

    मूंग का चूर्णिल आसिता (पाऊडरी मिल्डयू )
    नियंत्रण : सल्फर फफूंद नाशी ४ ग्राम या केराथेन १ मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें

    कद्दू वर्गीय फसलों में मृदुरोमिल असिता (डाउनी मिल्डयू) रोग
    नियंत्रण : रोग के लक्षण दिखाई देते ही मेटाल्याक्सिल या रिडोमिल एम झेड १ ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिडकाव करें

    कद्दू वर्गीय फसलों में लाल भृंग (रेड पम्पकिन बीटल) कीट
    मैलाथियान 50 ईसी / 500 मिली या डाइमेथोएट 30 ईसी 500 मिली या मिथाइल डेमेटोन 25 ईसी / 500 मिली हेक्टेयर का छिड़काव करें क्लोरपायरीफॉस 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने से करनवयस्क कद्दू के बीटल मर जाते हैं

    भिन्डी में पीत शीरा मोजेक रोग
    नियंत्रणः खेत में पीला चिपचिपा पाश १० प्रति एकड़ खेत में खड़ा करें रोग की शुरुवाती अवस्था में रोगग्रस्त पौधे उखाड़कर नष्ट करे सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रीड १७.८ एस एल ०.५ मिली या ऐसीटामिप्रीड २० एस पी. ०.५ ग्राम या डायमिथोएट २ मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करे।

    अन्य सावधानियाँ
    कृषि श्रमिक एवं समस्त किसान कार्य मे क्रियान्वयन होने से पहले, कार्यो के दौरान एवं कार्यो के उपरांत व्यक्तिगत स्वछता तथा उचित दूरी को सुनिश्चित करें। यथा संभव गेंहू की कटाई के लिए कम्बाइन कटाई मशीन का उपयोग किया जाना चाहिए। फसल कटाई एवं मशीनों के रख रखाव मे लगे श्रमिकों की सावधानी एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। फसलों की हाथ से कटाई एवं तुड़ाई के दौरान कार्यरत श्रमिकों के बीच उचित दूरी का ध्यान रखें । कार्यरत सभी किसान श्रमिकों को सुनिश्चित करना चाहिए कि वे मास्क पहनकर ही काम करे तथा बीच-बीच मे साबुन से हाथ धोते रहे। किसी अनजान श्रमिक को खेत मे कार्य से रोके ताकि वो इस महामारी का कारण न बन सके। जहां तक संभव हो परिचित व्यक्ति को ही खेतो के कार्य मे लगाए। कृषि कार्य मे प्रयुक्त सन्यंत्रों को कार्यों के पूर्व तथा कार्यो के दौरान स्वच्छ किया जाना चाहिए। साथ ही भण्डारण समग्रियों को भी साफ किया जाना चाहिए। खलिहानों मे कटी हुई फसल को छोटे-छोटे ढेरों मे इकठ्ठा करे जिनकी आपस मे दूरी 1 मीटर से अधिक हो। साथ ही प्रत्येक ढेर पर भीड़ इकठ्ठा करने से बचे। प्रक्षत्रो पर कृषि कार्यो दौरान किसानों श्रमिकों को चेहरे पर मास्क अवश्य लगाना चाहिए ताकि वायु-कण एवं धूल-कण से बचा जा सके और श्वास संबन्धित तकलीफों से सावधान रहा जा सके। अनाजों तथा दालों को कीटों से बचाने हेतु, भंडारण के पूर्व उन्हे पर्याप्त सुखा ले कृषक भाई अपने उत्पादो को बाजार स्थल तक ले जाने के दौरान अपनी निजी सुरक्षा का भरपूर ध्यान रखे। कृषक बंधु हरी खाद के सनई, ढैचा की बुवाई के लिए खेत तैयार करें तथा ४५-५० किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। साथ ही खरीफ फसलों कि तैयारी हेतु खेतों कि ग्रीष्मकालीन जुताई का कार्य भी करें। (श्रोत-पी.पी. जाम्भूलकर, अनीता पूयाम)

    पर्यावरण एवं खेत की मिट्टी का स्वास्थ्य बचाने हेतु गेंहूॅ की नरवाई न जलाएं

    बुंदेलखण्ड में आजकल देखा जा रहा है कि कहीं कहीं किसान भाई गेहू कटाई के बाद खेत में शेष बचे अवशेष (नरवाई) में आग लगा रहे है,जबकि राज्य सरकार एवं कृषि वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर नरवाई नहीं जलाने हेतु जागरूकता रैली, कृषक प्रशिक्षण, कृषक संगोष्ठी व मिडिया का सहयोग लेकर अखबार, रेडियों एवं टीवी के माध्यम से जानकारी दी जाती रहती है। साथ ही जिला प्रशासन द्वारा भी नरवाई जलाने को गम्भीर अपराध की श्रेणी में लेकर सजा का प्रावधान किया गया है। नरवाई जलाने के बारे में किसान भाईयों में विगत वर्षो में काफी जागरूकता आयी है। फिर भी कुछ किसान सहयोग नहीं कर रहें एवं चोरी छुपे सुबह, शाम या देर रात में खेत में नरवाई जला देते है।अतः किसानभाईयों से आग्रह है, कि वे अपने खेत में आग न लगाएं एवं नरवाई न जलाएं। अपने खेत की मिट्टी को जीवित रखे एवं शासन प्रशासन का सहयोग करें, पर्यावरण को बचाएं। नरवाई जलाने से नुकसान-कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि,गेहू की फसल काटने के बाद जो नरवाई होती है, किसानभाई उसे आग लगाकर नष्ट कर देते है। नरवाई में लगभग नत्रजन 0.5 प्रतिशत, स्फुर 0.6 और पोटाश 0.8 प्रतिशत पाया जाता है, जो नरवाई में जलकर नष्ट हो जाता है। गेहू फसल के दाने से डेढ़ गुना भूसा होता है। यदि एक हेक्टर में 40 क्विंटल गेहू का उत्पादन होगा, तो भूसे की मात्रा 60 क्विंटल होगी, भूसे से 30 किलों नत्रजन, 36 किलों स्फुर, 90 किलों पोटाश प्रति हेक्टेयर प्राप्त होगा। जो वर्तमान मूल्य के आधार पर लगभग रूपए 3000 का होगा, जो जलकर नष्ट हो जाता है। भूमि में उपलब्ध जैव विविधता समाप्त हो जाती है, अर्थात् भूमि में उपस्थित सूक्ष्म जीव एवं केचुआं आदि जलकर नष्ट होने से खेत की उर्वरकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। भूमि क उपरी पर्त में उपलब्ध पोषक तत्व आग लगने के कारण जलकर नष्ट हो जाते है। भूमि की भौतिक दशा खराब हो जाती है। भूमि कठोर हो जाती है, जिसके कारण भूमि की जल धारण क्षमता कम हो जाती है। फलस्वरूप फसलें जल्द सूखती है। भूमि में होने वाली रासायनिक क्रियाएं भी प्रभावित होती है, जैसे कार्बन-नाईट्रोजन एवं कार्बन-फास्फोरस का अनुपात बिगड़ जाता है। जिससे पौधों को पोषक तत्व ग्रहण करने में कठिनाई होती है। नरवाई की आग फैलने से जन-धान की हानि होती है एवं पेड़ पौधे जलकर नष्ट हो जाते है। नरवाई नहीं जलाने के फायदे प्रति हेक्टेयर लगभग रूपये 3000 की बचत,भूमि में पाये जाने वाले लाभदायी जीवणुओं का संरक्षण, पोषक तत्वों का संरक्षण,भूमि की भौतिक दशा में सुधार होगा।भूमि की रासायनिक क्रियाओं में सन्तुलन होने से पोषक तत्वों की उपलब्धता सुलभ होगी।पर्यावरण प्रदुषण में कमी आवेगी।अतः किसान भाई नरवाई में आग न लगाये। खेत की जुताई करे या रोटावेटर चलाकर नरवाई को यथास्थान जमीन में मिला दे। जिससे जैविक खाद तैयार होगी और नरवाई जलाने के दुष्परिणामों को कम किया जा सकेगा।

    गर्मियों में प्राकृतिक जूस से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा जल की मात्र बढ़ाएं

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन में एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ अमित सिंह , डॉ धनश्याम अवरौल तथा डॉ रंजीत पाल ने बताया है कि इस समय कोरोना वायरस के प्रकोप में शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा जल की मात्रा बढाना आवश्यक है। इसके लिये मौजूद प्राकृतिक रसों का उपयोग किया जा सकता है ऐसी स्थिति में अधिक से अधिक पानी और जूस पीने की सलाह दी जाती है। क्योंकि गर्मियों में हमारी बॉडी डिहाइड्रेट हो जाती है, आप अपने शरीर में पानी की कमी जूस के जरिए भी पूरी कर सकते हैं। टेस्ट के साथ-साथ अपनी हेल्थ का भी ध्यान रखते हुए गर्मियों में अपनी बॉडी को स्वच्छ, स्वस्थ और रिफ्रेश रखने के लिए परंपरागत जूस के साथ-साथ कुछ नए ड्रिंक का भी प्रयोग कर सकते हैं। पूरे दिन की थकान और गर्मी को भगाने के लिए इन अलग-अलग जूस का सेवन कर सकते हैं। आम, बेल, गन्ना, नीबू, पपीता, पुदीना, मौसमी तरबूज आदि का रस प्राकृतिक रूप से गर्मियों में उपलब्ध होता है। इनसें विटामिन, लवण, प्रोटीन, और अन्य पोषक तत्व मिलते है।

    आम का जूस
    -आम के सेवन करने से कई बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है इसके साथ ही यह स्वाद में काफी अच्छा होता है। इसमें विटामिन्स और मिनरल्स अधिक मात्रा में होता है। जिनकी जरूरत बॉडी को गर्मियों में अधिक होती है। यह पेट और दिल से संबंधित बीमारियों को भी कम करता है। आम के जूस में विटामिन सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है जो प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ बनाने में एक अहम भूमिका निभाता है। एक गिलास आम के जूस हमारे शरीर में 70 से 80 प्रतिशत विटामिन सी की पूर्ति करता है। विटामिन सी श्वेत रक्त कणिकाओं के उत्पादन में भी लाभप्रद है।

    बेल का जूस या शरबत
    -बेल के जूस में प्रोटीन, थायमिन, राइबोफ्लेविन और विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है। इसके नियमित सेवन से एसिडिटी नियंत्रण के साथ-साथ मुंह में छाले और मधुमेह का भी नियंत्रण होता हैं।

    गन्ने का रस
    -गर्मियों में हीट स्टोक अथवा डिहाइड्रेशन से बचने के लिए गन्ने का रस सबसे बेहतर विकल्प है। इसमें ग्लूकोज, मैग्नीशियम, कैल्शियम अधिक मात्रा में होता है। यह बहुत ही तेजी से बॉडी को हाइड्रेट करता है। इसके साथ ही ज्वाइंडिस जैसी घातक बीमारी में कारगर है साथ ही गर्भवती महिलाओं के लिए बेहतरीन पेय पदार्थ है। इस कारण एनीमिया कैंसर आदि बीमारियों से हमें बचाता है।

    लेमन जूस
    -अदरक के साथ नींबू का जूस गर्मियों में काफी लाभदायक होता है इसमें विटामिन सी पाई जाती है जो पेट के लिए काफी लाभदायक है। नींबू अदरक का जूस बालों, स्किन के साथ-साथ मसूड़ों की बीमारियों और पथरी को भी ठीक करता है।

    पपीते का जूस
    -पपीते के जूस में विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, फाइबर, मैग्नीशियम और फलेवोनाईडस प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो पेट से संबंधित समस्याओं से लड़ने में एक दवा की तरह काम करता है। इसे खाने से पाचन प्रणाली भी अच्छी रहती है तथा गर्मियों में आपके दिल की भी देखभाल करता है।

    मिंट आईस टी
    -पुदीने की साथ आईस टी पीने से चाय की जो गर्माहट होती है वह कम हो जाती है। क्योंकि पुदीना शरीर को ठंडा करता है। पुदीने की पत्तियां गर्म पानी में उबाल लें और फिर आईस टी बनाते वक्त उसमें डाल दें। इसे बनाने के कई तरीके हो सकते हैं। यह शरीर को सिर्फ ठंडक ही नहीं पहुंचाता बल्कि मिंट से पेट से संबंधित समस्याएं भी कम होती हैं।

    मौसमी का जूस
    -यह विटामिन सी, आयरन, पोटैशियम, कॉपर आदि का अच्छा स्त्रोत है। मौसमी का जूस स्किन, पिंपल, बदहजमी, कब्ज जैसी समस्याओं से आराम दिलाने में सहयोगी है। विटामिन सी की प्रचुरता से ये स्कर्वी-मसूड़ों में खून का आना जैसी बीमारी को नियंत्रित करने में सहयोग करता है।

    तरबूज का जूस
    -तरबूज लाइकोपीन का बहुत अच्छा स्त्रोत है। यह एक एंटीऑक्सीडेंट है जो फ्री रेडिकल्स को कम करने में मदद करता है। इसके जूस से किडनी से संबंधित रोग नहीं होता साथ ही साथ पथरी को भी बढ़ने से रोकता है और स्किन के लिए भी फायदेमंद है। तरबूज में काफी मात्रा में पानी पाया जाता है जो कि शरीर के लिए लाभदायक है।

    फूलो की खेती में सामयिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में फूलो की खेती में सामयिक सुझाव जारी किया है। इस समय लॉकडाउन के कारण फूलो की खेती में किसानों को बाजार के अभाव में काफी परेशानी हो रही है। फिर भी इसकी उपयोगिता और लाभ देखते हुये सामायिक सस्य क्रियाओं को करना आवश्यक है। रानी लक्ष्मी बाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ गौरव शर्मा ने फूलों की खेती हेतु समसामयिक सलाह दी है कि लॉकडाऊन के कारण गेंदा के जो फूल लगें रह गए हों उन्हे बीज के लिए अब छोड़ दें। जो फूल नहीं बिके उन्हे छांव में सुखाएँ एवं हो सके तो प्राकृतिक रंग या खाद के लिए उपयोग में लें। ग्रीष्म कालीन गेंदे के लिए नर्सरी की तैयारी करें। ग्लेडिओलस के कंद को मिट्टी से निकालने का उपयुक्त समय है। अगर लॉकडाऊन के कारण कोल्ड स्टोरेज में पहुंचाने में दिक्कत हो तो एक बार सिंचाई कर दें। सेवन्ति (गुलदाउदी) में उसके तने के पास से निकलने वाली सकर्स को अलग कर लगा दें। अगर अभी अलग नहीं किया है तो फिर पौधों में नाइट्रोजन वाले खाद को डालें। गुलाब में पाऊड्री मिलड्यू फफूंद जनित बीमारी के बचाव हेतु 0.02 प्रतिशत बाविस्टीन फफूंद नाशक का प्रयोग करें। ग्रीष्मकाल में खेत खाली होने पर मिट्टी परीक्षण हेतु खेत से मिट्टी के नमूने लें। गर्मी के फूलों जैसे जीनिया, पोर्चुलाका व कोचिया के पौधों की सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई कर दें।

    पशुपालकों एवं दूध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह

    रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय झॉसी के कुलपति डॉ अरविन्द कुमार के निर्देशन एवं निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ एस एस सिंह के मार्गदर्शन में पशुपालकों एवं दुग्ध विक्रेताओं के लिए सामायिक सलाह जारी किया है। इस समय कोविड-19 के विश्व व्यापी संक्रमण रोग की परिस्थिति में दुधारू पशुओ से जुड़े किसानों और दूध विक्रेताओं को सतर्क और सजग रहने की आवश्यकता हैं। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण सलाह डॉ संजीव कुमार एवं डॉ आशुतोष ने बताया कि कुछ बातों का मान पूर्वक अनुसरण करे। दूध विक्रेता अथवा पशुपालकों द्वारा विभिन्न ग्राहकों को दूध की आपूर्ति करते समय, बीच-बीच में अपने हाथों को सैनिटाइज करते रहना चाहिए या साबुन से नियमित अन्तराल पर हाथ धोते रहना चाहिए। एकत्र किये गए दूध को तुरंत साफ कपड़े से छानना चाहिए और इसे ठंडे स्थान में ढककर रखना चाहिए। यदि दूध को खुले में बेचा जाना है, तो इसे जल्द से जल्द ढके बर्तन व शीतल परिस्थितियों में उपभोक्ता खुदरा बाजार तक ले जाना चाहिए । यदि पैकिंग सुविधाएँ उपलव्ध हैं, तो दूध की पैकिंग और पैक किये गए दूध की विक्री को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । यदि संभव होतो ऑनलाइन लेन देन हेतु उपयुक्त संसाधन का उपयोग करे और नगद भुगतान से बचें। बीमार महसूस होने पर दूध या दूध के प्रसंस्करण के कार्यों में शामिल न हों।दूध बेचते समय विक्रेता को हाथो में हर समय दस्ताने पहनने चाहिए परन्तु ये नहीं समझे कि दस्ताना पहनना हाथ धोने का विकल्प है। अतः दूध विक्री के दौरान भी नियमित अंतराल पर हाथ धोना अनिवार्य है। उपयोग पश्चात उचित रूप से दस्ताने और मास्क निकले और उन्हें सुरक्षित रूप से ढक्कन युक्त कचरे के डब्बे में डाल दें। घर पर बनाये गए मास्क को दोबारा उपयोग से पहले अच्छी तरह धो कर सुखा लेना चाहिए । दूध मापने हेतु लंबे हैंडल वाल बर्तन का प्रयोग करें, यदि बीच-बीच में आपने किसी और भी चीज को छुआ हो तो हाथों को साफ करने के बाद ही पुनः इसे छुएं। दूध बेचने वाले व्यक्ति को पूर्ण (फुल) आस्तीन वाली कमीज पहननी चाहिए एवं अन्य व्यक्ति से सुरक्षित दुरी (कम से काम 6 फीट) से बनाकर रखे । कार्य के बाद वापस घर आने पर तुरंत कपड़े हटादें और उन्हें धो ले। परिवार के किसी सदस्य विशेषकर बुजुर्गो और बच्चों के साथ बातचीत करने से पहले स्नान करे । घर के बाहर जूते निकले और उन्हें अलग रखें।दूध वितरण को इस तरह से नियमित करे कि जिनसे मानव संपर्क न्यूनतम हो, जैसे कि एक क्षेत्र में दो दिनों में एक बार पहुंचाना। दूध और दूध उत्पादों का वितरण हेतु उत्पाद को क्रेता के दरवाजे पर छोड़कर या कम से कम 6 फीट के अंतर को बनाए रखे ताकि मानव संपर्क से बचाजा सके। घरों में ज्यादा स्पर्श बिन्दुओ जैसेकी दरवाजे की घंटी, उनके हैंडल आदि से संपर्क से बचा जाना चाहिए और यदि संपर्क में आते हैं तो हाथ अच्छी तरह से साफ किया जाना जाना चाहिए । बिक्री काउंटर पर मास्क और दस्ताने पहनें और ग्राहकों से सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए कहें। यदि दूध या दूध उत्पादों को वितरित करने के लिए उपयोग किया जाने वाला वाहन हॉट स्पॉट के रूप में चिन्हित क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो इसे दूसरे उपयोग से पहले अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए। कोविद -19 से खुद को बचाने के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी किये गए दिशा-निर्देशों का पालन करें।